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Financial Crisis In India - Brief Study

Thursday, January 2, 2020

घटता उत्पादन, बढ़ती महंगाई और बेरोज़गारी की चौतरफ़ा मार

आर्थिक मोर्चे पर एक ही दिन में कई महत्वपूर्ण सूचनायें सामने आईं हैं। एक ओर अक्टूबर में लगातार तीसरे महीने औद्योगिक उत्पादन में 3.8% की गिरावट हुई है तो वहीं फुटकर महंगाई दर बढ़कर तीन साल के उच्चतम स्तर 5.54% पर पहुँच गई। यह भी खबर आई कि ग्रामीण क्षेत्र में दैनिक मजदूरी दर में 3.54% की कमी दर्ज की गई है। वहीं सरकार और रिजर्व बैंक द्वारा लगातार एक साल से ब्याज दरों में कमी की कोशिश करने के बाद भी खुद सरकार के अपने ऋण पर ब्याज दर गिर नहीं रही बल्कि 10 वर्षीय सरकारी प्रतिभूति पर ब्याज दर बढ़कर 6.80% हो गई है। ऐसे में भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति समझने हेतु इन सब सूचनाओं को एक साथ जोड़कर विश्लेषण करने की जरूरत है।

औद्योगिक उत्पादन को देखें तो बिजली उत्पादन, खनन, मैनुफेक्चरिंग, निर्माण सभी में लगातार कमी आ रही है। उपभोक्ता सामानों में टिकाऊ उपभोक्ता उत्पादों का उत्पादन 18% घटा है। पर उससे भी महत्वपूर्ण है रोज़मर्रा के प्रयोग वाले उपभोक्ता उत्पादों के उत्पादन में 1.1% की कमी क्योंकि नमक, चीनी, चाय, बिस्कुट, ब्रेड, जैसे रोज़मर्रा इस्तेमाल के इन सामानों की बिक्री पर किसी भी आर्थिक चक्र का प्रभाव सबसे अंत में होता है अतः आम तौर पर इनके उत्पादन में गिरावट दुर्लभ ही होती है। इनके उत्पादन में कमी आर्थिक संकट की तीव्रता की परिचायक है।

एक और अन्य महत्वपूर्ण सूचना है पूंजीगत वस्तुओं के उत्पादन में 22% की भारी कमी। ये वह वस्तुएं हैं जो उपभोक्ताओं द्वारा नहीं खरीदी जातीं बल्कि इनका उपयोग नए उद्योगों की स्थापना द्वारा पूंजी निवेश में होता है। इनका उत्पादन तभी कम होता है जब अर्थव्यवस्था में नया निवेश ठप हो जाये। इस समय यही होता नजर आ रहा है। इसकी वजह भी है। पहले से ही अर्थव्यवस्था में माँग के अभाव और अति-उत्पादन की समस्या जारी है जिससे उद्योगों में पहले से ही स्थापित क्षमता का उपयोग कई वर्षों से 68-75% के बीच रहा है।
किन्तु हाल के महीनों में औद्योगिक उत्पादन में आई गिरावट ने स्थापित क्षमता के उपयोग को लगभग 65% तक गिरा दिया है। यदि पहले से ही स्थापित उद्योग अपनी एक तिहाई क्षमता का प्रयोग नहीं कर पा रहे हैं तो कोई पूँजीपति नया पूंजी निवेश क्यों करेगा? इसलिए पूँजीगत वस्तुओं की माँग और उत्पादन में भारी कमी दर्ज की जा रही है। परंतु यह एक दुष्चक्र है क्योंकि पूँजीगत वस्तुएं खुद औद्योगिक उत्पादन का एक महत्वपूर्ण अंश हैं। अतः इनके उत्पादन में कमी से माँग में और भी कमी आती है।

उत्पादन में कमी का प्रभाव रोजगार पर होना निश्चित है इसीलिये हम पिछले काफी समय से बेरोजगारी की दर में ऐतिहासिक वृद्धि देख रहे हैं, खास तौर पर 15-29 वर्ष वाले युवा वर्ग में तो बेरोजगारी की दर लगभग 30% पर पहुँच रही है जो देश की युवा पीढ़ी के जीवन में गहन हताशा और कुंठा को जन्म देकर बहुत सी सामाजिक समस्याओं का भी कारण बन रहा है। साथ ही विकराल बेरोजगारी के कारण श्रम बाजार में श्रम शक्ति की आपूर्ति माँग की तुलना में बेहद अधिक हो जाने से श्रम शक्ति के बाजार दाम उसके वास्तविक मूल्य से नीचे चले गए हैं अर्थात मजदूरी की दर गिर रही है।
विशेषतया ग्रामीण श्रमिकों की मजदूरी दर पर इसका अत्यंत नकारात्मक असर पड़ा है क्योंकि शहरी क्षेत्रों में रोजगार में हुई कमी से बहुत से ग्रामीण मजदूर जो पूर्ण या अंशकालिक तौर पर शहरों में मजदूरी करते थे अब उन्हें कृषि या अन्य ग्रामीण पेशों में मजदूरी ढूँढने के लिए विवश होना पड़ रहा है और इस होड के कारण वहाँ मजदूरी दर गिर रही है। लेबर ब्यूरो द्वारा जुटाये आंकड़ों के अनुसार 25 ग्रामीण पेशों में औसत दैनिक मजदूरी सितंबर 2019 के महीने में 331 रुपये रही जो आंकिक तौर पर तो सितंबर 2018 से 3.42% अधिक है पर अगर वास्तविक मजदूरी अर्थात ग्रामीण मजदूरों के लिए महँगाई दर को मिलाकर देखें तो यह पिछले वर्ष से 3.77% कम हुई है। शहरी क्षेत्रों में भी कमोबेश ऐसा ही हाल है।

किंतु यह वो श्रमिक हैं जो अपनी पूरी आय को मूलभूत आवश्यकता की उपभोक्ता वस्तुओं के उपभोग में खर्च करते हैं। उनकी वास्तविक आय में हुई इस कमी से हमें उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन में गिरावट के कारण का भी पता चल जाता है। साथ ही यह राष्ट्रीय सांख्यिकी संगठन के उस सर्वेक्षण के नतीजों की भी पुष्टि करता है जिसमें ग्रामीण उपभोग में गिरावट की बात सामने आई थी जिसके बाद सरकार ने उस सर्वेक्षण के आँकड़ों को सार्वजनिक तौर पर जारी करने से इंकार कर दिया था।

किंतु आम लोगों के जीवन में संकट को जो बात और भी बढ़ा रही है वह है फुटकर महँगाई दर में जारी वृद्धि। नवंबर में यह बढ़कर 40 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुँच गई है। सामान्य परिस्थितियों में माँग व बिक्री में गिरावट से महँगाई दर में वृद्धि के बजाय कमी होनी चाहिए थी। थोक मूल्य सूचकांक को देखें तो ऐसा हुआ भी है। परंतु फुटकर मूल्य सूचकांक खास तौर पर खाद्य वस्तुओं के मूल्य सूचकांक में तेज वृद्धि हुई है। ध्यान देने की बात यही भी है कि खाद्य वस्तुओं के मूल्य सूचकांक में ग्रामीण के मुक़ाबले शहरी क्षेत्रों में बहुत अधिक वृद्धि हुई है। इसका अर्थ है कि खाद्य वस्तुओं के व्यापार में मौजूद एकाधिकार इस वृद्धि का कारण है और इसका लाभ उत्पादकों के बजाय इस बीच के वर्ग को ही हो रहा है। अतः इससे ग्रामीण माँग में वृद्धि पर भी कोई सकारात्मक लाभ मिलने वाला नहीं है।

अब हम ब्याज दरों वाले चौथे पक्ष को देखते हैं। कई वर्षों से भारतीय पूँजीपति वर्ग का सरकार और रिजर्व बैंक पर भारी दबाव रहा है कि ब्याज दरों में कटौती की जाये। इसकी मुख्य वजह है पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था के अपने नियमों के कारण प्रति इकाई पूँजी पर लाभ की दर में हो रही गिरावट जिसके कारण पूँजीपति वर्ग के लिए ऊँची ब्याज दर पर लिए गए ऋणों का ब्याज चुकाना मुश्किल हो रहा है और बैंकों के सामने डूबते ऋणों का भारी संकट खड़ा हो गया है। चूँकि कर्ज पर ब्याज लाभ में से ही चुकाया जाता है अतः लाभ दर गिरने पर ब्याज दर गिरने की आवश्यकता खड़ी हो जाती है। हालाँकि इससे बचत करने वालों जैसे मध्यम वर्ग व पेंशनरों आदि को तकलीफ होता है जो बचत कर बैंकों को देते ही इसलिए हैं ताकि इससे पूँजीपतियों को ऋण देकर उनके लाभ का एक हिस्सा प्राप्त करें।
ब्याज दर कम करने के इस दबाव के चलते रिजर्व बैंक ने पिछले एक वर्ष में 5 बार में अपनी ब्याज दर में 1.35% की कमी की है। किंतु पहले से ही यह जाहिर है कि रिजर्व बैंक द्वारा की गई इस कटौती से आम तौर पर ऋणों पर ब्याज दर में समुचित कमी नहीं हो रही है बल्कि पहले से लिए गए ऋणों पर यह उल्टे औसतन 0.02% बढ़ गई है। वजह है कि एक और तो परिवारों की आमदनी घटने और महँगाई बढ़ने के कारण बचत क्षमता में गिरावट हुई है, दूसरी ओर सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर में कमी को रोकने के लिए सरकार ने ऋण लेकर काफी खर्च किया है। साथ में बजट के बाहर सार्वजनिक उद्यमों के नाम पर भी सरकार ने काफी ऋण लिया है।
बजट में बताये गये 3.4% के वित्तीय घाटे के मुक़ाबले अधिकांश विश्लेषकों का मानना है कि केंद्र-राज्य सरकारों व सार्वजनिक क्षेत्र का कुल घाटा लगभग 10% है। आर्थिक मंदी के कारण कर वसूली लक्ष्य से बहुत पीछे है, उधर सरकार बड़े पूँजीपतियों को प्रत्यक्ष करों में छूट भी दे रही है। नतीजा यह कि चालू वित्तीय वर्ष में अब तक अनुमान से 2 लाख करोड़ रुपए कम कर राशि एकत्र हुई है। इसके चलते सरकार की ऋण आवश्यकता परिवारों द्वारा की जाने वाली कुल बचत से भी अधिक हो गई है। माँग-पूर्ति में इस असंतुलन के चलते सरकार को दिये जाने वाले ऋणों पर ब्याज दर घटने का नाम नहीं ले रही है और 10 वर्षीय प्रतिभूतियों पर यह 6.80% के उच्च स्तर पर पहुँच गई है।

बढ़ते सरकारी ऋण का एक और पक्ष यह है कि सितंबर तिमाही में आंकिक जीडीपी वृद्धि दर 6.1% रही। किंतु सरकार को उससे अधिक ब्याज दर पर ऋण लेना पड़ रहा है, अतः सरकार की कर या गैर कर आय ब्याज के मुक़ाबले कम गति से बढ़ने वाली है अर्थात सरकार के कर्ज जाल फँसने की संभावनाएं भी बढ़ती जा रही हैं। इस वजह से भी बैंक उसे कम ब्याज दर पर ऋण देने के इच्छुक नहीं हैं। सरकार के कर्ज जाल में फँस जाने से उसके लिए यह जरूरी हो जायेगा कि वह आय बढ़ाने के प्रयास करे।
पूँजीपतियों को तो पहले से रियायत दी जा रही है अतः उन पर तो नया बोझ डालने संभावना को नकारा जा सकता है। अतः एक ही रास्ता बचता है आम जनता पर इस सब का बोझ डालना – एक और अप्रत्यक्ष करों में वृद्धि कर जिसके लिए जीएसटी की दर बढ़ाने का प्रस्ताव है, दूसरी ओर जरूरी मदों में खर्च घटाकर, जैसे प्राथमिक शिक्षा के लिए आबंटित बजट में पहले ही तीन हजार करोड़ रुपये की कटौती की खबर आ चुकी है।

https://hindi.newsclick.in/Declining-production-rising-inflation-and-unemployment
13/12/2019

आधारभूत ढाँचे में विशाल निवेश - अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

साल 2019 के अंतिम दिन फिर एक बार वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में अर्थव्यवस्था के उद्धारकर्ता देवदूत के अपने जाने पहचाने अवतार में प्रकट हुईं। इस बार जो बड़ी घोषणाओं की बौछार हुई वह आधारभूत ढाँचे में भारी भरकम निवेश से संबंधित थीं। वित्त मंत्री ने ऐलान किया कि उसके उच्च अधिकार कार्य बल ने 102 लाख करोड़ रुपये के निवेश की योजनाओं को स्वीकृति दे दी है तथा अगले कुछ महीने में 3 लाख करोड़ रुपये की और योजनाओं को भी मंजूरी दी जायेगी। इस प्रकार कुल 105 लाख करोड़ रुपये के कुल पूँजी निवेश की योजना प्रस्तुत की गई।
102 लाख करोड़ की योजनाओं में 18 राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों की योजनायें बताई गईं हैं जो 22 विभिन्न मंत्रालयों के अंतर्गत आती हैं। ये प्रोजेक्ट मुख्यतः इन क्षेत्रों में हैं - ऊर्जा (25 लाख करोड़ रुपये), सड़क (20 लाख करोड़ रुपये), रेलवे (14 लाख करोड़ रुपये), बंदरगाह व हवाई अड्डे (2.5 लाख करोड़ रूपये), डिजिटल (3.2 लाख करोड़ रुपये), सिंचाई, ग्रामीण, कृषि, खाद्य प्रसंस्करण (16 लाख करोड़ रुपये) तथा यातायात (16 लाख करोड़ रूपये)। इसमें से 47 लाख करोड़ रूपये की योजनायें पहले से क्रियान्वयन के चरण में हैं, 37 लाख करोड़ रुपये के प्रस्तावों की विस्तृत योजना तैयार है और 18 लाख करोड़ रुपये के लिए विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाई जा रही है। विभिन्न वित्तीय वर्षों में सरकारी खर्च का अनुमान इस प्रकार है – वित्तीय वर्ष 2020 – 13.6 लाख करोड़ रुपये, 2021 – 19.5 लाख करोड़ रुपये, 2022 – 19 लाख करोड़ रुपये, 2023 – 13.8 लाख करोड़ रुपये, 2024 – 13 लाख करोड़ रुपये, 2025 - लाख करोड़ रुपये।
इस विशाल घोषित खर्च के लिए वित्तीय स्रोत क्या होगा? वित्त मंत्री के अनुसार इस खर्च में 39-39% का बराबर हिस्सा केंद्र तथा राज्यों के जिम्मे होगा जबकि 22% निवेश निजी क्षेत्र के जिम्मे होगा। यह खर्च निवेश के लिए बनाए गए विशेष संस्थानों के जरिये होगा, जो वित्तीय बाजार से कर्ज जुटायेंगे। निजी क्षेत्र का निवेश पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के जरिये आयेगा। यहाँ यह जरूरी हो जाता है कि अर्थव्यवस्था की वर्तमान स्थिति और सरकारी वित्तीय घाटे की मौजूदा हालत के परिप्रेक्ष्य में इतने बड़े निवेश की संभावना और उसके संभावित नतीजों का विश्लेषण किया जाये।
31 दिसंबर को ही यह तथ्य भी सामने आया कि चालू वित्तीय वर्ष के दिसंबर में समाप्त पहले नौ महीनों में कुल वित्तीय घाटा पूरे वित्तीय वर्ष के बजट अनुमानों का 115% हो चुका है। प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष करों, विशेष तौर पर जीएसटी, की वसूली बजट अनुमानों से लगभग दो लाख करोड़ पीछे होने की खबरें भी पहले से सुज्ञात हैं। हालाँकि सरकार अपने वित्तीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 3.2% बताती रही है किंतु सार्वजनिक क्षेत्र के कुल घाटे (केंद्र सरकार + राज्य सरकार + सार्वजनिक उद्यम) को जोड़ा जाये तो कुल वित्तीय घाटा जीडीपी के 9% के ऊपर है जिसके लिए सरकारों को वित्तीय बाज़ारों से विभिन्न प्रकार से कर्ज लेना पड़ रहा है। किंतु कॉर्पोरेट क्षेत्र को छोड़कर कुल घरेलू क्षेत्र की सालाना बचत सकाल घरेलू उत्पाद का मात्र 7% ही है अर्थात सरकार की ऋण आवश्यकता ही अर्थव्यवस्था में कुल बचत से 2% अधिक है। आपूर्ति की तुलना में माँग अधिक है इसीलिए रिजर्व बैंक द्वारा रिपो रेट में 1.35% की कमी और सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद भी ऋण पर वास्तविक ब्याज दरें कम नहीं हो पा रही हैं। ऋण दरों को कम करने के लिए रिजर्व बैंक पिछले दो सप्ताह से ऑपरेशन ट्विस्ट चला रहा है जिससे वह दस साल के दीर्घ काल के लिए वित्तीय बाजार में नकदी प्रवाह बढ़ा सके और ब्याज दरें गिरें।
साथ ही अधिकांश जनता की आय भी बढ़ नहीं रही है जबकि महँगाई विशेष तौर पर शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में निजीकरण व व्यवसायीकरण के तेज होते दौर से महँगाई बहुत तेजी से बढ़ी है। श्रमिक व गरीब किसानों के पास तो बचत की संभावना पहले ही बहुत सीमित थी, किंतु आज की स्थिति में मध्यम वर्ग की वित्तीय बचत क्षमता भी अत्यंत सिकुड़ गई है। अतः घरेलू क्षेत्र की बचत से वित्तीय आपूर्ति बढ़ने की भी तुरंत कोई आशा नहीं है। फिर सरकार निवेश के लिए ऋण कहाँ से जुटाएगी? उसके पास एक ही विकल्प बचाता है। वह है रिजर्व बैंक द्वारा नकदी प्रवाह अर्थात नये नोट छापकर मुद्रा प्रसार को बढ़ावा देना। किंतु वह मुद्रा के मूल्य को कम कर आम जनता पर चोर दरवाजे से लगाये टैक्स के समान है। अर्थात कुल मिलाकर आम जनता की जेब से ही आधारभूत ढाँचे पर इस विशाल निवेश का खर्च जुटाया जायेगा।
जहाँ तक निजी क्षेत्र का सवाल है वह पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) के जरिये इन प्रोजेक्ट में भागीदारी करेगा। पिछले 20 सालों में इन पीपीपी प्रोजेक्ट का अनुभव बताता है कि इसके जरिये कुल खर्च में एक छोटा हिस्सा वहन करने के बावजूद निजी पूँजीपति इन प्रोजेक्ट के मालिक बन जाते हैं, इनसे होने वाली आय को पीछे से चुराते हैं और जब प्रोजेक्ट घाटे में आ जाते हैं तो घाटे को सार्वजनिक क्षेत्र के सिर डालकर अलग हो जाते हैं। खास तौर पर पीपीपी मॉडल की सबसे बड़ी प्रणेता आईएलएफ़एस और उसकी 335 अनुषंगी कंपनियों के जरिये जिस लूट को अंजाम देकर 2018 में कंपनी को पूरी तरह डुबा दिया गया वह ही पिछले 15 महीने से चल रहे गैर वित्तीय कंपनियों और बैंकों के आर्थिक संकट की एक मुख्य वजह रहा है। तजुरबा यही कहता है कि पीपीपी का अर्थ है – लाभ प्राइवेट, घाटा सार्वजनिक!  
एक तीसरा पक्ष है कि मौजूदा आर्थिक संकट का मुख्य कारण सिकुड़ती माँग है जिसके कारण पहले से ही स्थापित उद्योग क्षमता के 65-70% पर ही उत्पादन कर पा रहे हैं तथा उनमें ऋण से हुये पूँजी निवेश पर ब्याज चुकाने तक की नकदी आय नहीं जुटा पा रहे हैं। तब नये आधारभूत उद्योग कैसे लाभप्रद होंगे और 2008-09 में किए गए ऐसे ही निवेश के परिणामस्वरूप 2012-13 में बैंकों के सामने आये विशाल डूबे ऋणों के संकट को दोबारा पैदा नहीं करेंगे? खास तौर पर जिस तरह से पूरे आधारभूत ढाँचे की योजना आधिकांश आबादी की जरूरतों के बजाय 10% अमीर जनसंख्या की चाहत आधारित हो गई है उसमें इनके लिए पर्याप्त माँग कहाँ से आयेगी? इसके लिए दिल्ली मेट्रो का उदाहरण ले सकते हैं जहाँ भाड़े में वृद्धि होते ही यात्रियों की संख्या में भारी गिरावट हो गई। मुंबई में एसी लोकल व मेट्रो के लिए जिन किरायों की चर्चा है उससे भी यात्रियों की संख्या बहुत होने की संभावना नहीं है। अतः कुछ साल में ही ये विशाल चमकते प्रोजेक्ट भारी घाटे में रहने की संभावना है और इनका खर्च जुटाने के लिए आम जनता पर वसूली का एक नया दौर शुरू होगा।
मुकेश असीम, 31-12-2019

https://hindi.newsclick.in/Impact-of-huge-investment-in-infrastructure-on-economy

रिजर्व बैंक का ट्विस्ट, जोखिम भरा कदम


रिजर्व बैंक ने 23 दिसंबर से अपना पूर्व घोषित ऑपरेशन ट्विस्ट शुरू किया। इसके तहत रिजर्व बैंक अल्पकालिक अर्थात एक वर्ष तक की ऋण प्रतिभूतियां बेच रहा है और दीर्घकालिक अर्थात 10 वर्षीय ऋण प्रतिभूतियों को खरीद रहा है। सोमवार को रिजर्व बैंक ने दस हजार करोड़ रुपये की दीर्घकालिक प्रतिभूतियां खरीदी किंतु इतने ही लक्ष्य के बावजूद वह 6 हजार करोड़ रुपये की अल्पकालिक प्रतिभूतियां ही विक्रय कर पाया क्योंकि अन्य बोली लगाने वाले रिजर्व बैंक द्वारा घोषित मूल्य को ऊँचा मान रहे थे जिससे उन्हें अपनी लगाई रकम पर आशा से कम ब्याज प्राप्त होता। रिजर्व बैंक आगे भी इस दोहरी खरीद बिक्री को जारी रखने वाला है।
रिजर्व बैंक इस प्रकार की दोहरी खरीद बिक्री कर क्यों रहा है? असल में अभी एक ओर तो अल्पकालीन मुद्रा बाजार में नकदी आपूर्ति माँग से अधिक है, जबकि दीर्घकालिक ऋण के क्षेत्र में सरकार और रिजर्व बैंक के जी तोड़ प्रयासों के बावजूद ब्याज दरें गिर नहीं पा रही हैं जिससे नकदी की कमी से जूझ रही सरकार के सामने भारी संकट खडा हो गया है। इन दोनों तथ्यों को अलग अलग विस्तार से समझना जरूरी है।

पिछले तीन महीने से मुद्रा बाजार के अल्पकालिक छोर पर लगभग तीन लाख करोड़ रुपये अतिरिक्त उपलब्ध हैं। स्थिति यह है कि नकदी प्रबंधन के लिए बैंकों व अन्य वित्तीय संस्थानों द्वारा लिये दिये जाने वाले एक दो दिनी ऋणों पर ब्याज दर रिजर्व बैंक के रिपो रेट 5.15% से भी नीचे चले जाने की स्थितियां आ चुकी हैं। इसकी मूल वजह है बिक्री की कमी से औद्योगिक पूँजीपतियों ने अपना उत्पादन स्तर व उत्पादित माल का भंडारण कम किया है। इससे इस कार्य में प्रयुक्त चालू पूँजी की माँग कम हुई है जो अल्पकाल के लिए नकद उधार के तौर पर ली जाती है और बिक्री की रकम से वापस बैंक में जमा की जाती है। साथ ही फिलहाल गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की संकटग्रस्त स्थिति के कारण बैंक उन्हें भी अल्पकालीन ऋण देने में आश्वस्त महसूस नहीं करते।

उधर पिछले कई वर्षों से सरकार और औद्योगिक पूँजीपति दोनों ही ब्याज दरों को कम करने के लिए भारी दबाव बनाये हुए हैं। औद्योगिक पूँजीपति ब्याज दर कम चाहते हैं क्योंकि जड पूँजी (जमीन, इमारत, मशीनों, तकनीक) में भारी पूँजी निवेश के मुताबिक बिक्री में वृद्धि न होने से उनकी प्रति इकाई पूँजी पर लाभ की दर पिछले दशक में तेजी से गिरी है जबकि यह पूँजी निवेश ऋण पूँजी से किया गया था। लाभ दर कम होने से उनके लिए ऋण पर उच्च ब्याज दर चुकाना मुमकिन नहीं है और बैंक ऋण डूब रहे हैं अर्थात एनपीए हो रहे हैं। वहीं मंदी के चलते सरकार की कर व गैर कर आय भी बजट अनुमान से काफी कम है और सरकार को अपने या सार्वजनिक संस्थानों के नाम पर भारी कर्ज लेना पड रहा है। अतः दोनों की जरूरत ब्याज दरों में कटौती है।

अतः ऑपरेशन ट्विस्ट के जरिये रिजर्व बैंक अल्पकालिक ऋण प्रतिभूतियां बेच कर अतिरिक्त नकदी को बाजार से समेट रहा है ताकि नकदी की आपूर्ति कम होने से ब्याज दर बढ जाये। दूसरी ओर वह दीर्घकालिक ऋण प्रतिभूतियां खरीद बाजार में नकदी प्रसारित कर रहा है। इससे दीर्घकालिक ऋण की माँग कम हो जायेगी और उस पर ब्याज दर कम हो सकेगी। तुरंत में ऐसा प्रभाव हुआ भी है तथा दस वर्षीय ऋण पर ब्याज दर पिछले सप्ताह के 6.87% से कम होकर 23 दिसंबर को 6.57% ही रह गई।

किंतु क्या इस ट्विस्ट से ब्याज दरें स्थाई तौर पर कम हो सकेंगी? ब्याज दर अंत में एक व्यक्ति द्वारा पूँजी के प्रयोग का अधिकार दूसरे को देने के बदले वसूली जाने वाली कीमत है। अतः अन्य सभी कीमतों की ही तरह यह कीमत भी बाजार में माँग पूर्ति के संतुलन से ही तय होती है। अभी पूरे सरकारी तंत्र का वित्तीय घाटा अनुमानों के अनुसार लगभग 10% पहुंच गया है, और उसकी ऋण आवश्यकता बढती जा रही है। दूसरी ओर बैंक में जमा के द्वारा पूँजी उपलब्ध कराने वाले गृहस्थ क्षेत्र की बचत पिछले सालों में तेजी से गिरी है क्योंकि आय बढ नहीं रही है और उसकी तुलना में खर्च, खास तौर पर शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन पर बढती महँगाई के चलते तेजी से बढा है। परिणाम यह है कि गृहस्थ क्षेत्र की सम्पूर्ण बचत अभी सरकारी क्षेत्र की आवश्यकताओं को भी पूरा नहीं कर पा रही है जबकि निजी क्षेत्र की ओर से भी ऋण की कुछ अतिरिक्त माँग है। इसलिये रिजर्व बैंक द्वारा पाँच बार अपनी ब्याज दर घटाने से भी वास्तविक बाजार में ब्याज दरें कम नहीं हो रही हैं। इस मूल समस्या के समाधान तक यह ट्विस्ट भी ब्याज दरों को कम करने में सफल होगा इसमें शक है।

वहीं रिजर्व बैंक जो मुद्रा प्रसार कर रहा है वह नये नोट छापने के समान ही है। कहा जाये तो सरकार के खर्च को चलाने के लिए रिजर्व बैंक मुद्रा प्रसार कर रहा है। परंतु बिना उत्पादन वृद्धि के मुद्रा प्रसार आम जनता पर चोर दरवाजे से लगाये गए टैक्स के समान ही है क्योंकि यह मुद्रा के मूल्य को कम करता है। इससे व्यक्तियों की वास्तविक आय कम हो जाती है। अतः यह पहले से ही संकुचित माँग की समस्या से ग्रस्त भारतीय अर्थव्यवस्था में बाजार माँग को और भी संकुचित कर संकट को और भी गहरा करने का जोखिम भरा कदम सिद्ध हो सकता है। हालाँकि रिजर्व बैंक का मानना है कि अल्पकालिक मुद्रा संकुचन दीर्घकालिक मुद्रा प्रसार के प्रभाव को संतुलित कर देगा किंतु यह अति आशावाद ही अधिक प्रतीत होता है।

मुकेश असीम
24-12-2019