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Financial Crisis In India - Brief Study

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Sunday, February 2, 2020

बजटः ‘अच्छे दिनों’ के नाम पर तकलीफदेह दिन दिखाने की तैयारी


साल 2020-21 का बजट ऐसे वक्त में पेश किया गया जब किसी को भी इस बात में कोई शक नहीं रह गया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था गंभीर संकट के भंवरजाल में फंसी हुई है। कुछ वक्त से बहस सिर्फ इस मुद्दे पर ही थी कि क्या सरकार सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों पर खर्च कम कर वित्तीय घाटा नियंत्रित करने की नवउदारवादी नीतियों को जारी रखेगी या अर्थव्यवस्था को किकस्टार्ट करने के लिये सरकारी खर्च बढ़ाने की कींसवादी नीति अपनायेगी। बहुत से आर्थिक विशेषज्ञ यह उम्मीद कर रहे थे कि सरकार आम मेहनतकश लोगों व मध्यम वर्ग के हाथ में कुछ पैसा पहुंचाने का प्रयास करेगी ताकि बाजार में उपभोक्ता माँग का विस्तार हो जिससे उत्पादन के क्षेत्र में पूँजी निवेश फिर से शुरू हो सके। इसके लिये नरेगा के लिये बजट बढ़ाने, शहरों में रोजगार गारंटी योजना शुरू करने, मध्यम वर्ग के लिये आयकर में छूट बढ़ाने आदि की चर्चा चल रही थी।  

पर सरकारी खर्च बढ़ाने की नीति में पहले से ही सुरसा के मुँह की तरह बढ़ता वित्तीय घाटा मुख्य रुकावट नजर आ रहा था क्योंकि धीमी पड़ती अर्थव्यवस्था में टैक्स वसूली हो या अन्य सरकारी आय दोनों में भारी कमी हुई है। वर्तमान वित्तीय वर्ष में अभी तक टैक्स वसूली पिछले वित्तीय वर्ष से भी कम है जबकि सरकार का बजट अनुमान इसमें लगभग 24% वृद्धि का था। इससे सार्वजनिक क्षेत्र के नाम पर लिये गये कर्जों सहित सरकार का कुल वित्तीय घाटा तमाम तरह से छिपाने के प्रयासों के बावजूद 3.3% के लक्ष्य के बजाय लगभग 8-10% के आसपास पहुँच चुका है। ऊपर से इस वर्ष सरकार ने बड़े पूँजीपतियों को कॉर्पोरेट टैक्स में भी लगभग डेढ़ लाख करोड़ रु की रियायत दी है। अतः सरकारी खर्च में भारी वृद्धि की गुंजाइश बहुत मुश्किल लग रही थी।

31 जनवरी को जब सालाना आर्थिक सर्वेक्षण संसद में प्रस्तुत किया गया तभी यह बात स्पष्ट हो गई थी कि सरकार की वित्तीय स्थिति अच्छी नहीं है और वह विनिवेश, निजीकरण, व्यवसायीकरण को तेज करने व शिक्षा, स्वास्थ्य, आदि सामाजिक सेवाओं पर खर्च घटाने की नवउदारवादी नीतियों को जारी रखेगी। आर्थिक सर्वे में सार्वजनिक उद्यमों का निजीकरण तेज करने, खाद्य सबसिडी घटाने, शिक्षा का व्यवसायीकरण जारी रखने, बाजार के अदृश्य हाथ पर भरोसा करने और सरकारी हस्तक्षेप को कम करने पर ज़ोर दिया गया था। आर्थिक सर्वे नवउदारवाद के पक्ष में इतनी मजबूती से खड़ा था कि शिक्षा के व्यवसायीकरण से उसके महँगा होने और समाज के कमजोर वर्गों के उच्च शिक्षा से बाहर होते जाने की बात स्वीकार करने के बावजूद भी व्यवसायीकरण की नीति को जारी रखने की बात कही गयी थी।

वित्त मंत्री ने जब बजट पेश किया तो आर्थिक सर्वे में कही गई बातों पर ही बढ़ती नजर आईं। पर बजट का आय-व्यय खाते का हिसाब देखें तो यह बजट नवउदारवाद और कींसवाद दोनों की सबसे बदतर बातों का घटिया मिक्स्चर है अर्थात सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों पर खर्च में तो भारी कटौती हुई ही है, मगर सरकार का बजट घाटा भी नियंत्रित होने के बजाय बहुत ज्यादा बढ़ गया। भारत जैसे देश में जो 117 देशों के भूख सूचकांक में 102 वें स्थान पर है वहाँ बजट में खाद्य सबसिडी का बजट 70 हजार करोड़ रु घटा दिया गया है – 1.85 लाख करोड़ रुपये से 1.15 लाख करोड़ रुपये। वैसे तो इसके भी वास्तव में खर्च किए जाने पर शक है क्योंकि इस साल में भी बजट अनुमान 1.85 लाख करोड़ के बजाय संशोधित अनुमान के अनुसार वास्तविक खर्च 1.08 लाख करोड़ ही किया जा रहा है। इसका अर्थ है कि पहले ही लगभग दो लाख करोड़ रु के कर्ज में डूब चुकी फूड कार्पोरेशन पूरी तरह दिवालिया होने के कगार पर है और खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम के अंतर्गत आने वाली सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) का भविष्य समाप्ति की ओर है। देश की सबसे गरीब जनता के लिए यह खबर मौत की घंटी के बराबर है क्योंकि पहले ही झारखंड जैसे राज्यों से राशन न मिलने से मौतों की खबरें आती रही हैं।

सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों पर दूसरा बड़ा हमला स्वास्थ्य सेवाओं पर है जहाँ एक तो महँगाई दर की तुलना में देखने पर खर्च का बजट प्रावधान घट गया है, वहीं दूसरी ओर देश में डॉक्टरों की कमी दूर करने के नाम पर जिला अस्पतालों को निजी क्षेत्र को सौंपने का षड्यंत्र तैयार है। बजट घोषणा के अनुसार पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल में जिला अस्पतालों के साथ मेडिकल कॉलेज खोले जायेंगे। मेडिकल कॉलेज के लिए शुरुआती पूँजी भी निजी क्षेत्र को सरकार ही देगी जिसका पैसा मेडिकल उपकरणों पर सेस लगाकर जुटाया जायेगा, यह सेस बजट में लगा भी दिया गया है अर्थात बहुत से मेडिकल उपकरण और भी महँगे हो जायेंगे जिसका खामियाजा अंत में मरीजों को ही भुगतना होगा। इस योजना का अर्थ है कि जिला अस्पतालों का पहले से मौजूद पूरा बहुमूल्य तंत्र निजी क्षेत्र के हाथ में होगा जिन्हें पूँजी भी खुद नहीं जुटानी होगी। इसका प्रयोग कर वे महँगी फीस वाले निजी मेडिकल कॉलेज खोलकर खूब मुनाफा कमायेंगे, साथ ही कुछ सालों में जिला अस्पतालों के मालिक भी हो जायेंगे और देश की गरीब मेहनतकश जनता के लिए सस्ते अस्पताली इलाज का अंतिम सहारा भी छिन जायेगा। इसको एक काल्पनिक स्थिति न समझें क्योंकि मोदी के गुजरात का मुख्यमंत्री रहते भुज में भूकंप पीड़ितों के लिए सार्वजनिक धन से खोला गया अस्पताल इसी तरह पीपीपी मॉडल के जरिये अदानी की कंपनी को सौंपा जा चुका है। असल में अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में इस पीपीपी मॉडल का अर्थ ही हो गया है पब्लिक संपत्ति की प्राइवेट लूट।

इसी तरह की साजिश किसानों की आय दुगनी करने के सुनहरे सपने वाली घोषणाओं में देखी जा सकती है। एक और तो कृषि पर आबंटित व्यय मुद्रस्फीति की दर से तुलना करने पर स्थिर है, दूसरी ओर किसानों के नाम पर असल में कृषि आधारित उद्योगों को बड़ी सुविधायें और रियायतें देने की घोषणा की गई है। किसान रेल, किसान उड़ान, रेफ्रीजरेटेड ट्रक, वेयरहाउस, आदि के लिए खर्च कृषि उद्यमी और व्यापारी बन चुके अमीर किसानों और कृषि आधारित उद्योग चलाने वाले पूँजीपतियों के लाभ के लिए है। किसानों के 86% से अधिक भाग जिसके पास एक हेक्टेयर से भी कम जमीन है उसके लिए इससे क्या फायदा है। उनके लिए तो न्यूनतम समर्थन मूल्य देने से भी सरकार पीछे हट रही है। जो 1500 करोड़ का खर्च उस मद में पिछले साल घोषित हुआ था उसमें लगभग नहीं के बराबर खर्च किया गया है। इन गरीब, सीमांत किसानों को तो अपनी उपज उन अमीर किसानों को कौड़ियों के दाम ही बेचनी पड़ेगी जो इन किसान रेल, उड़ान, ट्रक, वेयरहाउस के जरिये व्यापार कर कृषि उत्पाद को शहरी उपभोक्ताओं को कई गुना महँगे दामों पर बेचकर तगड़ा मुनाफा कमायेंगे।

शिक्षा, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, महिला-बाल कल्याण, दलित-आदिवासी कार्यक्रमों सभी के विस्तार में जायें तो व्यय में कटौती या चोर दरवाजे से पूँजीपतियों को लाभ पहुंचाने की ऐसी ही स्थिति है पर सरकार का वित्तीय घाटा फिर भी अनियंत्रित ढंग से बढ़ा है। खुद सरकार मान रही है कि इस वर्ष के लक्ष्य 3.3% के मुक़ाबले यह 3.8% पर पहुँच गया है। किंतु अगर सरकार द्वारा बजट से बाहर एफ़सीआई, आदि सार्वजनिक कंपनियों के नाम पर लिए गये कर्ज को भी जोड़ा जाये तो अधिकांश विश्लेषकों के अनुसार यह 8 से 10% के आसपास पहुँच गया है। इसका सबसे बड़ा कारण है अर्थव्यवस्था में मंदी, सरकार द्वारा पूंजीपति वर्ग को दी गई बहुतेरी रियायतों एवं उनके द्वारा की गई भारी टैक्स चोरी के कारण टैक्स वसूली में भारी कमी। इस घाटे को पूरा करने के लिए सरकार को तमाम तरह के उपाय करने पड़ रहे हैं जैसे रिजर्व बैंक के रिजर्व कोष को खाली करना, सार्वजनिक उद्यमों एवं सम्पत्तियों को बेचना, आदि। इसी क्रम में अब सार्वजनिक क्षेत्र की महाकाय वित्तीय कंपनी एलआईसी में सरकारी शेयर बेचने का प्रस्ताव किया गया है। किंतु सवाल है कि संपत्ति बेचने की एक सीमा है, उसके बाद क्या? अभी तो यही कहा जा सकता है कि अंत में इन सरमायेदार परस्त नीतियों से हुये सरकारी घाटे का सारा बोझ विभिन्न तरह से आम मेहनतकश जनता के सिर पर ही लादा जाना है। स्पष्ट है कि यही नीतियाँ जारी रहीं तो देश की आम जनता को अच्छे दिनों के नाम पर अभी बहुत अधिक तकलीफदेह दिन देखने बाकी हैं।    

https://janchowk.com/pahlapanna/union-budget/

Thursday, January 2, 2020

आधारभूत ढाँचे में विशाल निवेश - अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

साल 2019 के अंतिम दिन फिर एक बार वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में अर्थव्यवस्था के उद्धारकर्ता देवदूत के अपने जाने पहचाने अवतार में प्रकट हुईं। इस बार जो बड़ी घोषणाओं की बौछार हुई वह आधारभूत ढाँचे में भारी भरकम निवेश से संबंधित थीं। वित्त मंत्री ने ऐलान किया कि उसके उच्च अधिकार कार्य बल ने 102 लाख करोड़ रुपये के निवेश की योजनाओं को स्वीकृति दे दी है तथा अगले कुछ महीने में 3 लाख करोड़ रुपये की और योजनाओं को भी मंजूरी दी जायेगी। इस प्रकार कुल 105 लाख करोड़ रुपये के कुल पूँजी निवेश की योजना प्रस्तुत की गई।
102 लाख करोड़ की योजनाओं में 18 राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों की योजनायें बताई गईं हैं जो 22 विभिन्न मंत्रालयों के अंतर्गत आती हैं। ये प्रोजेक्ट मुख्यतः इन क्षेत्रों में हैं - ऊर्जा (25 लाख करोड़ रुपये), सड़क (20 लाख करोड़ रुपये), रेलवे (14 लाख करोड़ रुपये), बंदरगाह व हवाई अड्डे (2.5 लाख करोड़ रूपये), डिजिटल (3.2 लाख करोड़ रुपये), सिंचाई, ग्रामीण, कृषि, खाद्य प्रसंस्करण (16 लाख करोड़ रुपये) तथा यातायात (16 लाख करोड़ रूपये)। इसमें से 47 लाख करोड़ रूपये की योजनायें पहले से क्रियान्वयन के चरण में हैं, 37 लाख करोड़ रुपये के प्रस्तावों की विस्तृत योजना तैयार है और 18 लाख करोड़ रुपये के लिए विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाई जा रही है। विभिन्न वित्तीय वर्षों में सरकारी खर्च का अनुमान इस प्रकार है – वित्तीय वर्ष 2020 – 13.6 लाख करोड़ रुपये, 2021 – 19.5 लाख करोड़ रुपये, 2022 – 19 लाख करोड़ रुपये, 2023 – 13.8 लाख करोड़ रुपये, 2024 – 13 लाख करोड़ रुपये, 2025 - लाख करोड़ रुपये।
इस विशाल घोषित खर्च के लिए वित्तीय स्रोत क्या होगा? वित्त मंत्री के अनुसार इस खर्च में 39-39% का बराबर हिस्सा केंद्र तथा राज्यों के जिम्मे होगा जबकि 22% निवेश निजी क्षेत्र के जिम्मे होगा। यह खर्च निवेश के लिए बनाए गए विशेष संस्थानों के जरिये होगा, जो वित्तीय बाजार से कर्ज जुटायेंगे। निजी क्षेत्र का निवेश पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के जरिये आयेगा। यहाँ यह जरूरी हो जाता है कि अर्थव्यवस्था की वर्तमान स्थिति और सरकारी वित्तीय घाटे की मौजूदा हालत के परिप्रेक्ष्य में इतने बड़े निवेश की संभावना और उसके संभावित नतीजों का विश्लेषण किया जाये।
31 दिसंबर को ही यह तथ्य भी सामने आया कि चालू वित्तीय वर्ष के दिसंबर में समाप्त पहले नौ महीनों में कुल वित्तीय घाटा पूरे वित्तीय वर्ष के बजट अनुमानों का 115% हो चुका है। प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष करों, विशेष तौर पर जीएसटी, की वसूली बजट अनुमानों से लगभग दो लाख करोड़ पीछे होने की खबरें भी पहले से सुज्ञात हैं। हालाँकि सरकार अपने वित्तीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 3.2% बताती रही है किंतु सार्वजनिक क्षेत्र के कुल घाटे (केंद्र सरकार + राज्य सरकार + सार्वजनिक उद्यम) को जोड़ा जाये तो कुल वित्तीय घाटा जीडीपी के 9% के ऊपर है जिसके लिए सरकारों को वित्तीय बाज़ारों से विभिन्न प्रकार से कर्ज लेना पड़ रहा है। किंतु कॉर्पोरेट क्षेत्र को छोड़कर कुल घरेलू क्षेत्र की सालाना बचत सकाल घरेलू उत्पाद का मात्र 7% ही है अर्थात सरकार की ऋण आवश्यकता ही अर्थव्यवस्था में कुल बचत से 2% अधिक है। आपूर्ति की तुलना में माँग अधिक है इसीलिए रिजर्व बैंक द्वारा रिपो रेट में 1.35% की कमी और सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद भी ऋण पर वास्तविक ब्याज दरें कम नहीं हो पा रही हैं। ऋण दरों को कम करने के लिए रिजर्व बैंक पिछले दो सप्ताह से ऑपरेशन ट्विस्ट चला रहा है जिससे वह दस साल के दीर्घ काल के लिए वित्तीय बाजार में नकदी प्रवाह बढ़ा सके और ब्याज दरें गिरें।
साथ ही अधिकांश जनता की आय भी बढ़ नहीं रही है जबकि महँगाई विशेष तौर पर शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में निजीकरण व व्यवसायीकरण के तेज होते दौर से महँगाई बहुत तेजी से बढ़ी है। श्रमिक व गरीब किसानों के पास तो बचत की संभावना पहले ही बहुत सीमित थी, किंतु आज की स्थिति में मध्यम वर्ग की वित्तीय बचत क्षमता भी अत्यंत सिकुड़ गई है। अतः घरेलू क्षेत्र की बचत से वित्तीय आपूर्ति बढ़ने की भी तुरंत कोई आशा नहीं है। फिर सरकार निवेश के लिए ऋण कहाँ से जुटाएगी? उसके पास एक ही विकल्प बचाता है। वह है रिजर्व बैंक द्वारा नकदी प्रवाह अर्थात नये नोट छापकर मुद्रा प्रसार को बढ़ावा देना। किंतु वह मुद्रा के मूल्य को कम कर आम जनता पर चोर दरवाजे से लगाये टैक्स के समान है। अर्थात कुल मिलाकर आम जनता की जेब से ही आधारभूत ढाँचे पर इस विशाल निवेश का खर्च जुटाया जायेगा।
जहाँ तक निजी क्षेत्र का सवाल है वह पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) के जरिये इन प्रोजेक्ट में भागीदारी करेगा। पिछले 20 सालों में इन पीपीपी प्रोजेक्ट का अनुभव बताता है कि इसके जरिये कुल खर्च में एक छोटा हिस्सा वहन करने के बावजूद निजी पूँजीपति इन प्रोजेक्ट के मालिक बन जाते हैं, इनसे होने वाली आय को पीछे से चुराते हैं और जब प्रोजेक्ट घाटे में आ जाते हैं तो घाटे को सार्वजनिक क्षेत्र के सिर डालकर अलग हो जाते हैं। खास तौर पर पीपीपी मॉडल की सबसे बड़ी प्रणेता आईएलएफ़एस और उसकी 335 अनुषंगी कंपनियों के जरिये जिस लूट को अंजाम देकर 2018 में कंपनी को पूरी तरह डुबा दिया गया वह ही पिछले 15 महीने से चल रहे गैर वित्तीय कंपनियों और बैंकों के आर्थिक संकट की एक मुख्य वजह रहा है। तजुरबा यही कहता है कि पीपीपी का अर्थ है – लाभ प्राइवेट, घाटा सार्वजनिक!  
एक तीसरा पक्ष है कि मौजूदा आर्थिक संकट का मुख्य कारण सिकुड़ती माँग है जिसके कारण पहले से ही स्थापित उद्योग क्षमता के 65-70% पर ही उत्पादन कर पा रहे हैं तथा उनमें ऋण से हुये पूँजी निवेश पर ब्याज चुकाने तक की नकदी आय नहीं जुटा पा रहे हैं। तब नये आधारभूत उद्योग कैसे लाभप्रद होंगे और 2008-09 में किए गए ऐसे ही निवेश के परिणामस्वरूप 2012-13 में बैंकों के सामने आये विशाल डूबे ऋणों के संकट को दोबारा पैदा नहीं करेंगे? खास तौर पर जिस तरह से पूरे आधारभूत ढाँचे की योजना आधिकांश आबादी की जरूरतों के बजाय 10% अमीर जनसंख्या की चाहत आधारित हो गई है उसमें इनके लिए पर्याप्त माँग कहाँ से आयेगी? इसके लिए दिल्ली मेट्रो का उदाहरण ले सकते हैं जहाँ भाड़े में वृद्धि होते ही यात्रियों की संख्या में भारी गिरावट हो गई। मुंबई में एसी लोकल व मेट्रो के लिए जिन किरायों की चर्चा है उससे भी यात्रियों की संख्या बहुत होने की संभावना नहीं है। अतः कुछ साल में ही ये विशाल चमकते प्रोजेक्ट भारी घाटे में रहने की संभावना है और इनका खर्च जुटाने के लिए आम जनता पर वसूली का एक नया दौर शुरू होगा।
मुकेश असीम, 31-12-2019

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