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Financial Crisis In India - Brief Study

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Saturday, August 29, 2020

जीएसटी - कारण और प्रभाव

जीएसटी और अन्य टैक्स नीतियों का मेहनतकशों की ज़ि‍न्दगी पर असर

मजदूर बिगुल, मई 2016

पिछले कुछ सालों से बडी चर्चा है जीएसटी की। सारा बुर्जुआ प्रचार तंत्र और उसके भाँड अर्थशास्त्री -विशेषज्ञ ऐसा समां बाँधने की कोशिश कर रहे हैं कि जीएसटी लागू होने से अर्थव्यवस्था में बडी तेजी आयेगी, कारोबार में तरक्की होगी और रोजगार के मौके बढेंगे। कु्छ छोटे बिन्दुओं को छोडकर सारी बुर्जुआ राजनीतिक पार्टियाँ भी इस पर कमो बेश एक राय हो चुकी हैं और अब सिर्फ एकमात्र शेष मुद्दा उनका आपस का यह द्वंद्व है कि किस को इसके लिये कितना श्रेय मिले। सवाल उठाना लाजिमी है कि आखिर जीएसटी में ऐसा क्या है कि पूरा बुर्जुआ तंत्र इस के लिये एक राय होकर इतना उतावला है और इसका मेहनतकश तबके के जीवन पर क्या असर होगा? इस दृष्टिकोण से इसका अध्ययन-विश्लेषण किया जाना बहुत जरूरी है।

जीएसटी लागू करने और इसके असर को समझने के लिये पहले हमें पूँजीवादी समाज में टैक्स नीति के कुछ मूल बिन्दूओं को समझना होगा। निजी सम्पत्ति पर आधारित पूँजीवादी व्यवस्था में राजसत्ता के खर्च को चलाने के लिये उत्पादन, आय, सम्पत्ति, व्यापार, आदि पर कर लगाना शासन व्यवस्था का एक आवश्यक अंग है। लेकिन यह सिद्धांत भी बुर्जुआ मानवतावादी जनतांत्रिक चिंतन की ही उपज था कि एक क्रमिक (Progressive) कर प्रणाली होनी चाहिये। इसका अर्थ है कि कर की दर आमदनी/सम्पत्ति के बढने के क्रम में बढनी चाहिये। लेकिन यह विचार 20वीं सदी में मजबूत मेहनतकश आन्दोलनों के डर से ही कुछ हद तक लागू हो पाया था। क्रमिक कराधान नीति के अनुसार व्यक्तिगत आयकर की दरें आमदनी के बढते क्रम में होनी चाहिये और कॉर्पोरेट कर भी इसके अनुरूप हो। साथ ही बडी सम्पत्ति पर सम्पत्ति कर और उसके उत्तराधिकार पर एस्टेट ड्युटी भी लगाई गयी। यह कर प्रणाली पूँजीवादी व्यवस्था में शोषण से मुक्ति तो नहीं पर मेहनतकश लोगों को कुछ तात्कालिक राहत प्रदान करती थी।

लेकिन जैसे ही मेहनतकश जनता के आन्दोलन अपने भटकावों की वजह से कमजोर पडे और पूँजीवादी व्यवस्था का संकट और तेज हुआ, बाकी देशों की तरह भारत में भी शासक वर्ग ने इस क्रमिक कर प्रणाली को बदलना शुरु कर दिया। लगातार परजीवी बनते पूँजीपति वर्ग ने नीति अपनाई करों का बोझ खुद से कमकर ज़्यादा से ज़्यादा पहले से ही शोषित मज़दूर, किसान, निम्न मध्य वर्गीय लोगों पर डालने की। इसके लिये आयकर/कॉरपोरेट कर की उच्चतम दरों को तो जाहिर है कम किया ही गया लेकिन और भी सूक्ष्म/जटिल कदम उठाये गये जो आम जनता को सीधे नजर न आयें लेकिन कर का बोझ अमीर तबके से कम कर गरीब लोगों के सिर पर डाल दें। इन उपायों की विस्तृत चर्चा नीचे है।

आय के कई स्रोत हैं। हालाँकि मेहनतकश लोगों के लिये तो उनकी मज़दूरी या छोटे-मोटे काम-धंधे से होने वाली बचत ही आय का मुख्य स्रोत है लेकिन जैसे-जैसे उच्च आय वर्ग की तरफ बढते हैं उनकी आय में वेतन का हिस्सा बहुत कम रह जाता है और उनकी ज़्यादातर आय आती है ब्याज, लाभांश और पूँजीगत लाभ से। ब्याज हम जानते हैं, लाभांश का मतलब है व्यवसाय के मुनाफे में पूँजी के मालिकों को मिलने वाला हिस्सा और पूँजीगत लाभ का मतलब है किसी सम्पत्ति – जमीन-मकान-शेयर-बॉन्ड्स, आदि – की कीमत में होने वाली बढत से मिलने वाला लाभ। तो चालाकी से परिवर्तन यह किया गया कि आय के इन स्रोतों पर वेतन आदि जैसी आयकर की सामान्य दरें लागू होने के बजाय कम दरें लागू की गईं। जैसे लाभांश पर बहुत साल से शून्य आयकर था; अब 10 लाख से ऊपर वाली रकम पर दोबारा लगाया गया लेकिन सामान्य 30% के बाजाय सिर्फ 10%। इसी प्रकार पूँजीगत लाभ पर शून्य, 5, 10 या 20% की दरें है (20% की दर के साथ उसे कम करने के लिये सूचीकरण का उपाय भी साथ ही है)। साथ ही सम्पत्ति कर और एस्टेट ड्युटी तो समाप्त ही कर दी गयी है। इस सबका सीधा नतीजा है कि जहाँ हमें बताया जाता है कि अमीर लोगों पर 30% का आयकर है वहाँ असल में सबसे अमीर लोगों को आपनी आय का लगभग मात्र 10 – 15% ही टैक्स देना होता है, वह भी अगर चोरी न करें तो! अगर कम्पनियों की बात करें तो इस बार के बजट में सरकार ने खुद बताया है कि घोषित 30% की दर के बजाय सबसे बडी कम्पनियाँ सिर्फ 21% की दर से ही कॉर्पोरेट टैक्स का भुगतान करती हैं।

अब बात करें गरीब मेहनतकश जनता पर लगने वाले करों की। कुछ लोग आश्चर्य करेंगे कि क्या गरीब लोग भी टैक्स देते हैं! ऐसा एक दुष्प्रचार समाज में खडा किया गया है कि सिर्फ 4% लोग ही टैक्स देते हैं और गरीब लोग सिर्फ सरकार से सबसिडी पाते हैं। लेकिन यह सच नहीं है – देश के सब लोग टैक्स देते हैं, गरीब से गरीब मज़दूर भी। असल में ऊपर जिन करों की बात हमने की वह हैं प्रत्यक्ष कर यानी जिस पर टैक्स लगा उसने दिया। दूसरे किस्म के कर हैं अप्रत्यक्ष कर जो लगते कम्पनियों/व्यापारियों पर हैं लेकिन जिनको आखिर देता आम नागरिक है क्योंकि वस्तुओं-सेवाओं की कीमतों में इन्हें शामिल कर लिया जाता है! यह है सेल्स्, वैट, एक्साइज, कस्टम्स, सर्विस टैक्स, चुंगी, आदि। तथाकथित आर्थिक सुधारों का एक पहलू इस प्रकार के अप्रत्यक्ष करों को लगाना और बढाना है। कुछ साल पहले 8% से शुरु हुआ सर्विस टैक्स देखते-देखते 15% पहुँच चुका है।

तीसरा पहलू है कर प्रणाली और सामान्य अर्थव्यवस्था में ऐसे नियम बनाना जिससे पूँजीपति तबका अपनी आमदनी/दौलत के एक बडे हिस्से को देश के बाहर ले जा सकें और कोई भी टैक्स न चुकायें। अगर वोडाफोन के मामले पर ध्यान दें तो पहले हच नाम की कम्पनी भारत में अपना मोबाइल कारोबार चलाती थी। फिर उसने यह कारोबार वोडाफोन को बेच दिया लेकिन भारत में स्थित सम्पत्ति की खरीद-बिक्री का यह काम हांगकांग में कर लिया गया और इस तरह लगभग 9,000 करोड रुपये का टैक्स बचा लिया गया। ऐसे ही अन्य बहुत से मामले हैं भारत में कारोबार करते या सम्पत्ति रखते बहुत सारे लोग खुद को दूसरे देशों का निवासी/नागरिक घोषित कर यहाँ शून्य या बहुत कम टैक्स अदा करते है।

अब इस परिस्थिति में देखते हैं जीएसटी को। ऊपर बताये गये अप्रत्यक्ष करों – सेल्स, सर्विस, एक्साइज, चुंगी, वैट, आदि – को मिलाकर अब एक नया कर जीएसटी लगाने का प्रस्ताव है। जीएसटी का एक मकसद तो है पूरे देश के पैमाने पर एक ही टैक्स व्यवस्था लागू करना। इससे पूरे देश में कारोबार करने वाली कम्पनियों को टैक्स के हिसाब व कागजी कार्रवाई में सहूलियत होगी। दूसरे, अभी सभी राज्यों में अलग नियम व कर दरें होने से बडी कम्पनियों को विभिन्न राज्यों के बाजार में कारोबार के लिये स्थानीय कारोबारियों के साथ अलग-अलग तरीके से प्रतियोगिता के लिये तैयार होना पडता है। जीएसटी लागू होने से पूरे देश का बाजार अब एक ही नियमों से संचालित होगा और बडे पूँजीपतियों के लिये इस ऐकीकृत बाजार में अपनी इजारेदारी/नियंत्रण स्थापित करना आसान हो जायेगा। आज बहुत सारी कम्पनियों को राज्यों के भिन्न टैक्स कानूनों के कारण राज्यवार अपने कारोबार को संचालित करना पडता है और कई मामलों में इस हिसाब से कुछ फैक्टरियाँ/गोदाम बनाने की भी जरूरत पडती है। जीएसटी लागू होने से यह जरूरत कम होगी और कुछ स्थानों से ही वह कुशलता से अपना कारोबार चला सकेंगी। कुछ स्थानों पर केन्द्रीकृत बडे कारखानों/गोदामों को चलाने के लिये कम मज़दूरों/कर्मचारियों की जरूरत होगी और वह श्रमिकों के वेतन पर अपना खर्च कम करने की स्थिति में होंगी; मतलब और मुनाफा। यही वजह है कि फिक्की, ऐसोचैम, सीआयीआयी, आदि पूँजीपतियों के संगठन इसके लिये सरकार और राजनीतिक दलों पर भारी दबाव बनाये हुए हैं।

जीएसटी का दूसरा पहलू है जनता पर इसका असर अर्थात ज़्यादा से ज़्यादा वस्तुओं और सेवाओं को करों के दायरे में लाना और इन करों की दर को ऊँचा करना। अभी जीएसटी के लिये 18 से 22% तक की दर की चर्चा सुनने में आ रही हैं अर्थात इसके लागू होने पर ज़्यादातर वस्तुओं-सेवाओं पर इतना कर देना पडेगा। उदाहरण के लिये 100 रुपये का मोबाईल रिचार्ज कराने पर उसका 18 से 22% प्रतिशत जीएसटी में जायेगा। नतीजा, और महँगाई। जिन देशों में पहले जीएसटी लागू हुई है उनमें ज़्यादातर में इसके बाद मुद्रास्फीति/महँगाई में वृद्धि हुई है; और भारत में यह मानने की कोई वजह नहीं कि ऐसा नहीं होगा।

तीसरी बात है कि यद्यपि जीएसटी की दर कहने के लिये सब पर बराबर होगी लेकिन इसका असर अमीर और गरीब लोगों पर बराबर नही होगा। जहां ज़्यादातर गरीब लोग अपनी सारी कमाई से किसी तरह जीवन चलाते हैं तो उनकी पूरी आय पर यह 18 से 22% टैक्स लग जायेगा क्योंकि जीएसटी लगभग सभी वस्तुओं – सेवाओं पर लगेगा। वहीं क्योंकि अमीर तबका अपनी आय का एक छोटा हिस्सा ही इन पर खर्च करता है तो आमदनी के हिस्से के रूप में देखा जाये तो वास्तव में गरीब मेहनतकश लोगों पर ज़्यादा टैक्स और जितना अमीर उतना ही कम!

कुल मिलाकर देखा जाये तो जीएसटी समेत इन टैक्स नीतियों की दिशा है पूँजीपति वर्ग को करों के बोझ से जितना हो सके बचाना और पूँजीवादी राजसत्ता को संभालने का बोझ भी पहले से ही शोषित-पीडित मेहनतकश तबके पर बढाना और उसकी पहले से ही सीमित आय में इस जरिये से और भी कटौती कर देना। इसका नतीजा होगा पूँजीपतियों के हाथ में धन और सम्पदा का और भी ज़्यादा केन्द्रीकरण और मज़दूर वर्ग की जिन्दगी में और भी ज़्यादा तबाही। असल में आज की स्थिति में शासक पूँजीपति वर्ग की वर्तमान व्यवस्था के संचालन में भी सिर्फ एक ही भूमिका रह गयी है – परजीवी जोंक की तरह सिर्फ खून चूसना। इसके सिवा उसका अन्य कोई योगदान नहीं है।

 

 जीएसटी : कॉरपोरेट पे करम, जनता पे सितम का एक और औज़ार

मजदूर बिगुल, जुलाई 2017

आखि़र केन्द्र-राज्यों में सत्ताधारी सभी पार्टियों ने पूर्ण सहमति से जीएसटी की दरें और नियम तय कर 1 जुलाई से इसे लागू कर दिया। पूँजीपति वर्ग के सभी संगठनों, कारपोरेट नियन्त्रित मीडिया और आर्थिक विशेषज्ञों द्वारा इसे ऐतिहासिक आर्थिक सुधार बताकर इसकी भारी वाहवाही की जा रही है। जीएसटी क़ानून बनाने में एक राय से सहमति जताने वाले कुछ विपक्षी भी सिर्फ़ इस बात की आलोचना कर रहे हैं कि इसे बगै़र पूरी तैयारी के लागू किया जा रहा है। तो क्या माना जाये कि पूरी तैयारी से लागू होने पर यह जनता के हित में होता? लेकिन इस क़िस्म की आलोचना एक समान हितों वाले वर्ग-रहित समाज में ही की जा सकती है। किन्तु हमारा समाज ऐसा समानता पर आधारित समाज नहीं है। इसमें जहाँ एक ओर 81% सम्पत्ति के मालिक 10% लोग हैं, वहीं ग़रीबी में जीते बहुसंख्यक मज़दूर-किसान और बहुत से छोटे काम-धन्धे करने वाले लोग भी हैं। इस समाज में कोई भी नीति ऐसी नहीं हो सकती जो सब वर्गों के लिए समान हितकारी हो और हर नीति का विश्लेषण इस आधार पर होना चाहिए कि इसका फ़ायदा किस तबक़े को होगा, नुक़सान किस तबक़े को। ऐसे वर्ग विभाजित, ग़ैर-बराबरी और शोषण पर आधारित समाज में प्रत्येक नीति का विभिन्न वर्गों की जि़न्दगी पर असर समझे बग़ैर की गयी कोई भी चर्चा निरर्थक या गुमराह करने वाली है। इस दृष्टिकोण से इसके कुछ अहम बिन्दुओं की चर्चा ज़रूरी है।

जीएसटी उत्पादन और बिक्री की प्रत्येक अवस्था में जोड़े गये मूल्य पर लगने वाला कर है, जिसे अन्तिम ख़रीदार या उपभोगकर्ता को चुकाना होता है। ऐसे करों को अप्रत्यक्ष कर कहा जाता है, क्योंकि ये कहने के लिए उत्पादक पर लगते हैं लेकिन इन्हें चुकाता उपभोक्ता है। पूँजीवादी जनवाद के दृष्टिकोण से भी देखा जाये तो अप्रत्यक्ष करों के दायरे को बढ़ाना एक प्रतिगामी क़दम है, क्योंकि इनकी दर सभी के लिए ‘समान’ होने से आमदनी के हिस्से के तौर पर देखें तो जितनी कम आमदनी हो उसका उतना बड़ा हिस्सा कर में देना पड़ता है और जितनी ज़्यादा आमदनी उतना कम हिस्सा। अर्थात इनका बोझ ग़रीब लोगों पर ज़्यादा और अमीर लोगों पर कम होता है। अगर तुलनात्मक रूप से विकसित पूँजीवादी देशों को भी देखें तो वहाँ कुल करों का दो तिहाई प्रत्यक्ष करों और एक तिहाई अप्रत्यक्ष करों से वसूल किया जाता है। भारत में पहले ही ठीक इसका उल्टा है अर्थात दो तिहाई अप्रत्यक्ष करों के ज़रिये आता है और अब इनका दायरा और बढ़ाया जा रहा है। इसके विपरीत ज़्यादा आमदनी पर ज़्यादा लगने वाले प्रत्यक्ष करों – आयकर, कारपोरेट कर, सम्पत्ति कर, विरासत कर, आदि में छूट दी जा रही है या ख़त्म किया जा रहा है। इस तरह जीएसटी के द्वारा अप्रत्यक्ष करों में वृद्धि से श्रमिकों को प्राप्त मज़दूरी का और बड़ा हिस्सा राज्य द्वारा लगान के रूप में लिया जाकर उनके शोषण को और तीव्र करेगा।

बहुत सारे छोटे व्यवसाय अब तक कर के दायरे से बाहर थे। अब इनमें से बहुत सारे कर के दायरे में आयेंगे। इससे इनकी लागत – कर की रक़म और प्रशासनिक लागत – दोनों तरह से बढ़ेगी। छोटे कारोबारियों की लागत बढ़ने, अन्तरराज्यीय कारोबारियों की लागत और प्रशासनिक बोझ कम होने, एक राज्य से दूसरे में यातायात-सप्लाई की रुकावटें कम होने से छोटे, अनौपचारिक कारोबारों को मिलने वाला स्थानीयता का लाभ समाप्त होगा। बड़े उद्योगों को उत्पादन और भण्डारण दोनों को कम स्थानों पर केन्द्रित कर पाना सम्भव होगा, जिसके चलते वह बड़े पैमाने के उत्पादन को अधिक पूँजी निवेश द्वारा और अधिक मशीनीकृत-स्वचालित कर उत्पादकता को बढ़ा पायेंगे। इस स्थिति में छोटी पूँजी वाले उद्योग और व्यापार बड़ी पूँजी वाले उद्योग-व्यापार के मुक़ाबले प्रतियोगिता में नहीं टिक पायेंगे। इसी तरह बहुत से कारीगर, दस्तकार, बुनकर, पॉवरलूम चलाने वाले स्वयं के धन्धे में लगे या कुछ मज़दूर लगाकर काम करने वाले उद्यमी भी बढ़ती लागत से अब बाज़ार में नहीं टिक पायेंगे और बड़े पूँजीपति के कारोबार में श्रमिक बन जायेंगे। उदाहरण के तौर पर निर्माण उद्योग के बाद श्रमिकों की संख्या की दृष्टि से दूसरे सबसे बड़े टेक्सटाइल उद्योग में स्थिति लघु इकाइयों के सामने संकट अत्यन्त गहरा है। महाराष्ट्र टेक्सटाइल प्रोसेसर एसोसिएशन के सेक्रेटरी ने कहा ही है – ‘85% लूम्स में बहुत छोटे व्यापारी हैं। जीएसटी डिसेण्ट्रलाइज़ सेक्टर को ख़त्म कर देगा। कम्पोज़िट मिल से हमारा कपडा महँगा हो जायेगा और सिर्फ़ बड़े संगठित प्लेयर को फ़ायदा होगा।’ इसीलिए सूरत, भिवण्डी, मुम्बई सब जगह ये उद्यमी अपने लूम्स को बन्द कर हड़ताल, धरना, प्रदर्शन में लगे हैं। इसी तरह छोटे दुकानदारों की क़ीमत पर बड़े मॉल और कारपोरेट स्टोर्स को लाभ होगा तथा छोटे दुकानदार इनमें कर्मचारी बनने के लिए मजबूर होंगे। इससे बडे पूँजीपतियों की इजारेदारी बढ़ेगी। इसीलिए पूँजीपतियों के सारे संगठन और उनका भोंपू मीडिया इसके पक्ष में इतने साल से माहौल बना रहा है।

लेकिन आज भारत में 90% रोज़गार अनौपचारिक, लघु क्षेत्र में है। संगठित क्षेत्र के बड़े उद्योगों को उन्नत आधुनिक तकनीक, श्रमिकों पर अधिक उत्पादकता के दबाव, परिमाण की मितव्ययिता, आदि की वज़ह से उतने ही उत्पादन के लिए कम श्रमिकों की आवश्यकता होती है। इसलिए इसलिए अनौपचारिक, लघु उद्योगों की क़ीमत पर बड़े उद्योगों की इज़ारेदारी के बढ़ने से रोज़गार के अवसर और भी कम होंगे। साथ ही इन छोटे उद्यमियों के समाप्त होकर श्रमिक बन जाने से बेरोज़गारों की रिज़र्व फ़ौज और बड़ी होगी जिससे पूँजीपति वर्ग अपने मुनाफ़े को बढ़ाने के लिए श्रम शक्ति के मूल्य अर्थात मज़दूरी को और भी कम करने का प्रयास करेगा। इस प्रकार मालिक पूँजीपति और श्रमिक वर्गों के बीच अन्तर्विरोध और संघर्ष और गहन एवं तीव्र होगा।

छोटे, अनौपचारिक उद्योगों पर इस संकट की मार पहले ही नोटबन्दी के द्वारा शुरू हो चुकी है, जिसके बाद के 4 महीनों जनवरी-अप्रैल में सेण्टर फ़ॉर मॉनिटरिंग इण्डियन इकोनॉमी के अनुसार 15 लाख नौकरियाँ कम हुई हैं। अब जीएसटी लागू होने के बाद यह प्रक्रिया और तेज़ होगी। लुधियाना, सूरत, भिवण्डी जैसे स्थानों से आने वाली रिपोर्टें पहले ही इसकी पुष्टि कर रही हैं, जहाँ लघु औद्योगिक इकाइयों द्वारा उत्पादन में कमी से श्रमिकों को छँटनी का सामना करना पड़ रहा है, उद्यमी कारीगरों-दस्तकारों के पास माल बनाने के आॅर्डर से उनका काम भी बन्द है और इनके माल के छोटे व्यापारी बिक्री के अभाव में ख़ाली बैठे हैं या जुलूस-धरने में लगे हैं।

जहाँ तक क़ीमतों का सवाल है, अधिक उत्पादों और कारोबारियों को कर दायरे में आने की वजह से बहुत से उत्पादों की क़ीमतें बढ़ना तय है। हालाँकि पहले से कर दायरे में आने वाले औपचारिक, संगठित क्षेत्र के उद्योगों को पिछले टैक्स का क्रेडिट अगले चरण में मिलने की वजह और कुछ उत्पादों पर कर की कम दर से उनके कुछ उत्पादों की क़ीमतें कम होंगी जैसे महँगी कारों या आई फ़ोन की क़ीमतों में कमी आयी है। इससे उच्च और मध्यम वर्ग के उपभोक्ताओं के लिए महँगाई का असर सम्भवतः उतना ज़्यादा नहीं भी हो, पर ग़रीब जनता द्वारा उपभोग की वस्तुओं पर महँगाई निश्चित ही बढ़ेगी, क्योंकि ये अधिकतर अनौपचारिक क्षेत्र के कर दायरे से बाहर के उत्पादों को छोटे दुकानदारों से ख़रीदते रहे हैं, जो अब कर दायरे के अन्दर होंगे।

पहले जीएसटी का एक मुख्य लाभ यह भी बताया गया था कि समान दरों, सरल प्रक्रियाओं से भ्रष्टाचार और कर चोरी कम होगी। लेकिन अब निर्धारित कई दरों, अधिभार, वस्तुओं के जटिल वर्गीकरण और दुरूह प्रक्रियाओं ने इससे चोरी-भ्रष्टाचार कम होने वाली बात की भी हवा पहले ही निकाल दी है। जैसे इंस्टेण्ट कॉफ़ी और रोस्टेड कॉफ़ी अलग दरों में आती हैं, होटल के कमरों पर किराये के आधार पर अलग दरें हैं। यही सब चीज़ें नौकरशाही के लिए सबसे प्रिय होती हैं, क्योंकि यह उन्हें मनमानी तरीक़े से कर निर्धारण और हेराफे़री का मौक़ा देती हैं। पर शायद कुछ और होने की आशा ही ग़लत होती, क्योंकि पहले से मौजूद क़ारोबारी-राजनीति-नौकरशाही गँठजोड़ के इस आधार को ही ख़त्म करने का जोखिम इनमें से कौन लेता!

जीएसटी का एक और पहलू विकास में क्षेत्रीय असन्तुलन है। असन्तुलित, असमतल आर्थिक विकास सामाजिक पैमाने पर अव्यवस्थित पूँजीवादी उत्पादन प्रक्रिया का अनिवार्य परिणाम है। योजनाबद्ध विकास के अभाव वाली पूँजीवादी व्यवस्था की वजह से पहले से ही भारत में भी विभिन्न राज्यों-क्षेत्रों के बीच असमतल विकास और क्षेत्रीय असन्तुलन एक बड़ी समस्या है जिसका प्रभाव राजनीति में जनता के बीच क्षेत्रीय वैमनस्य को पैदा करने के लिए किया जाता रहा है। पहले से ही असमतल क्षेत्रीय विकास की स्थिति में एक समान कर और एक बाज़ार की यह नीति इस इलाक़ाई असन्तुलन को और बढ़ायेगी, जैसे कि 1949 की पूरे देश में हर दूरी के लिए समान रेलवे भाड़ा नीति ने किया था और खनिज सम्पदा वाले राज्य जैसे तबका बिहार, उड़ीसा, मध्यप्रदेश औद्योगिक विकास में पिछड़ गये क्योंकि वहाँ प्राप्त होने वाले खनिज समान क़ीमत पर दूर-दराज के राज्यों में भी उपलब्ध थे और इस नीति से उन्हें इस खनिज उत्पादन का कोई लाभ नहीं मिला।

कुल मिलाकर देखा जाये तो पूँजीवादी व्यवस्था में पूँजी के संकेन्द्रण और इजारेदारी को बढ़ाने वाली जीएसटी की नीति से पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में अन्तर्निहित किसी समस्या का समाधान होने वाला नहीं है। बल्कि यह तात्कालिक रूप से इजारेदार पूँजी के मुनाफ़े को बढ़ाने हेतु टटपुँजिया वर्ग को बरबाद कर उन्हें श्रमिकों की श्रेणी में धकेलने की प्रक्रिया तेज़ करेगी, बेरोज़गारी की फ़ौज की तादाद को बढ़ायेगी, श्रमिकों की माँग और मज़दूरी को नीचे की और ले जायेगी। इससे उनकी क्रय शक्ति और कुल बाज़ार माँग कम होगी। इसके नतीजे में कुछ समय बाद बाज़ार में अतिउत्पादन का और भी गहरा संकट पैदा होगा।