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Financial Crisis In India - Brief Study

Sunday, February 2, 2020

बजटः ‘अच्छे दिनों’ के नाम पर तकलीफदेह दिन दिखाने की तैयारी


साल 2020-21 का बजट ऐसे वक्त में पेश किया गया जब किसी को भी इस बात में कोई शक नहीं रह गया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था गंभीर संकट के भंवरजाल में फंसी हुई है। कुछ वक्त से बहस सिर्फ इस मुद्दे पर ही थी कि क्या सरकार सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों पर खर्च कम कर वित्तीय घाटा नियंत्रित करने की नवउदारवादी नीतियों को जारी रखेगी या अर्थव्यवस्था को किकस्टार्ट करने के लिये सरकारी खर्च बढ़ाने की कींसवादी नीति अपनायेगी। बहुत से आर्थिक विशेषज्ञ यह उम्मीद कर रहे थे कि सरकार आम मेहनतकश लोगों व मध्यम वर्ग के हाथ में कुछ पैसा पहुंचाने का प्रयास करेगी ताकि बाजार में उपभोक्ता माँग का विस्तार हो जिससे उत्पादन के क्षेत्र में पूँजी निवेश फिर से शुरू हो सके। इसके लिये नरेगा के लिये बजट बढ़ाने, शहरों में रोजगार गारंटी योजना शुरू करने, मध्यम वर्ग के लिये आयकर में छूट बढ़ाने आदि की चर्चा चल रही थी।  

पर सरकारी खर्च बढ़ाने की नीति में पहले से ही सुरसा के मुँह की तरह बढ़ता वित्तीय घाटा मुख्य रुकावट नजर आ रहा था क्योंकि धीमी पड़ती अर्थव्यवस्था में टैक्स वसूली हो या अन्य सरकारी आय दोनों में भारी कमी हुई है। वर्तमान वित्तीय वर्ष में अभी तक टैक्स वसूली पिछले वित्तीय वर्ष से भी कम है जबकि सरकार का बजट अनुमान इसमें लगभग 24% वृद्धि का था। इससे सार्वजनिक क्षेत्र के नाम पर लिये गये कर्जों सहित सरकार का कुल वित्तीय घाटा तमाम तरह से छिपाने के प्रयासों के बावजूद 3.3% के लक्ष्य के बजाय लगभग 8-10% के आसपास पहुँच चुका है। ऊपर से इस वर्ष सरकार ने बड़े पूँजीपतियों को कॉर्पोरेट टैक्स में भी लगभग डेढ़ लाख करोड़ रु की रियायत दी है। अतः सरकारी खर्च में भारी वृद्धि की गुंजाइश बहुत मुश्किल लग रही थी।

31 जनवरी को जब सालाना आर्थिक सर्वेक्षण संसद में प्रस्तुत किया गया तभी यह बात स्पष्ट हो गई थी कि सरकार की वित्तीय स्थिति अच्छी नहीं है और वह विनिवेश, निजीकरण, व्यवसायीकरण को तेज करने व शिक्षा, स्वास्थ्य, आदि सामाजिक सेवाओं पर खर्च घटाने की नवउदारवादी नीतियों को जारी रखेगी। आर्थिक सर्वे में सार्वजनिक उद्यमों का निजीकरण तेज करने, खाद्य सबसिडी घटाने, शिक्षा का व्यवसायीकरण जारी रखने, बाजार के अदृश्य हाथ पर भरोसा करने और सरकारी हस्तक्षेप को कम करने पर ज़ोर दिया गया था। आर्थिक सर्वे नवउदारवाद के पक्ष में इतनी मजबूती से खड़ा था कि शिक्षा के व्यवसायीकरण से उसके महँगा होने और समाज के कमजोर वर्गों के उच्च शिक्षा से बाहर होते जाने की बात स्वीकार करने के बावजूद भी व्यवसायीकरण की नीति को जारी रखने की बात कही गयी थी।

वित्त मंत्री ने जब बजट पेश किया तो आर्थिक सर्वे में कही गई बातों पर ही बढ़ती नजर आईं। पर बजट का आय-व्यय खाते का हिसाब देखें तो यह बजट नवउदारवाद और कींसवाद दोनों की सबसे बदतर बातों का घटिया मिक्स्चर है अर्थात सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों पर खर्च में तो भारी कटौती हुई ही है, मगर सरकार का बजट घाटा भी नियंत्रित होने के बजाय बहुत ज्यादा बढ़ गया। भारत जैसे देश में जो 117 देशों के भूख सूचकांक में 102 वें स्थान पर है वहाँ बजट में खाद्य सबसिडी का बजट 70 हजार करोड़ रु घटा दिया गया है – 1.85 लाख करोड़ रुपये से 1.15 लाख करोड़ रुपये। वैसे तो इसके भी वास्तव में खर्च किए जाने पर शक है क्योंकि इस साल में भी बजट अनुमान 1.85 लाख करोड़ के बजाय संशोधित अनुमान के अनुसार वास्तविक खर्च 1.08 लाख करोड़ ही किया जा रहा है। इसका अर्थ है कि पहले ही लगभग दो लाख करोड़ रु के कर्ज में डूब चुकी फूड कार्पोरेशन पूरी तरह दिवालिया होने के कगार पर है और खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम के अंतर्गत आने वाली सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) का भविष्य समाप्ति की ओर है। देश की सबसे गरीब जनता के लिए यह खबर मौत की घंटी के बराबर है क्योंकि पहले ही झारखंड जैसे राज्यों से राशन न मिलने से मौतों की खबरें आती रही हैं।

सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों पर दूसरा बड़ा हमला स्वास्थ्य सेवाओं पर है जहाँ एक तो महँगाई दर की तुलना में देखने पर खर्च का बजट प्रावधान घट गया है, वहीं दूसरी ओर देश में डॉक्टरों की कमी दूर करने के नाम पर जिला अस्पतालों को निजी क्षेत्र को सौंपने का षड्यंत्र तैयार है। बजट घोषणा के अनुसार पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल में जिला अस्पतालों के साथ मेडिकल कॉलेज खोले जायेंगे। मेडिकल कॉलेज के लिए शुरुआती पूँजी भी निजी क्षेत्र को सरकार ही देगी जिसका पैसा मेडिकल उपकरणों पर सेस लगाकर जुटाया जायेगा, यह सेस बजट में लगा भी दिया गया है अर्थात बहुत से मेडिकल उपकरण और भी महँगे हो जायेंगे जिसका खामियाजा अंत में मरीजों को ही भुगतना होगा। इस योजना का अर्थ है कि जिला अस्पतालों का पहले से मौजूद पूरा बहुमूल्य तंत्र निजी क्षेत्र के हाथ में होगा जिन्हें पूँजी भी खुद नहीं जुटानी होगी। इसका प्रयोग कर वे महँगी फीस वाले निजी मेडिकल कॉलेज खोलकर खूब मुनाफा कमायेंगे, साथ ही कुछ सालों में जिला अस्पतालों के मालिक भी हो जायेंगे और देश की गरीब मेहनतकश जनता के लिए सस्ते अस्पताली इलाज का अंतिम सहारा भी छिन जायेगा। इसको एक काल्पनिक स्थिति न समझें क्योंकि मोदी के गुजरात का मुख्यमंत्री रहते भुज में भूकंप पीड़ितों के लिए सार्वजनिक धन से खोला गया अस्पताल इसी तरह पीपीपी मॉडल के जरिये अदानी की कंपनी को सौंपा जा चुका है। असल में अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में इस पीपीपी मॉडल का अर्थ ही हो गया है पब्लिक संपत्ति की प्राइवेट लूट।

इसी तरह की साजिश किसानों की आय दुगनी करने के सुनहरे सपने वाली घोषणाओं में देखी जा सकती है। एक और तो कृषि पर आबंटित व्यय मुद्रस्फीति की दर से तुलना करने पर स्थिर है, दूसरी ओर किसानों के नाम पर असल में कृषि आधारित उद्योगों को बड़ी सुविधायें और रियायतें देने की घोषणा की गई है। किसान रेल, किसान उड़ान, रेफ्रीजरेटेड ट्रक, वेयरहाउस, आदि के लिए खर्च कृषि उद्यमी और व्यापारी बन चुके अमीर किसानों और कृषि आधारित उद्योग चलाने वाले पूँजीपतियों के लाभ के लिए है। किसानों के 86% से अधिक भाग जिसके पास एक हेक्टेयर से भी कम जमीन है उसके लिए इससे क्या फायदा है। उनके लिए तो न्यूनतम समर्थन मूल्य देने से भी सरकार पीछे हट रही है। जो 1500 करोड़ का खर्च उस मद में पिछले साल घोषित हुआ था उसमें लगभग नहीं के बराबर खर्च किया गया है। इन गरीब, सीमांत किसानों को तो अपनी उपज उन अमीर किसानों को कौड़ियों के दाम ही बेचनी पड़ेगी जो इन किसान रेल, उड़ान, ट्रक, वेयरहाउस के जरिये व्यापार कर कृषि उत्पाद को शहरी उपभोक्ताओं को कई गुना महँगे दामों पर बेचकर तगड़ा मुनाफा कमायेंगे।

शिक्षा, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, महिला-बाल कल्याण, दलित-आदिवासी कार्यक्रमों सभी के विस्तार में जायें तो व्यय में कटौती या चोर दरवाजे से पूँजीपतियों को लाभ पहुंचाने की ऐसी ही स्थिति है पर सरकार का वित्तीय घाटा फिर भी अनियंत्रित ढंग से बढ़ा है। खुद सरकार मान रही है कि इस वर्ष के लक्ष्य 3.3% के मुक़ाबले यह 3.8% पर पहुँच गया है। किंतु अगर सरकार द्वारा बजट से बाहर एफ़सीआई, आदि सार्वजनिक कंपनियों के नाम पर लिए गये कर्ज को भी जोड़ा जाये तो अधिकांश विश्लेषकों के अनुसार यह 8 से 10% के आसपास पहुँच गया है। इसका सबसे बड़ा कारण है अर्थव्यवस्था में मंदी, सरकार द्वारा पूंजीपति वर्ग को दी गई बहुतेरी रियायतों एवं उनके द्वारा की गई भारी टैक्स चोरी के कारण टैक्स वसूली में भारी कमी। इस घाटे को पूरा करने के लिए सरकार को तमाम तरह के उपाय करने पड़ रहे हैं जैसे रिजर्व बैंक के रिजर्व कोष को खाली करना, सार्वजनिक उद्यमों एवं सम्पत्तियों को बेचना, आदि। इसी क्रम में अब सार्वजनिक क्षेत्र की महाकाय वित्तीय कंपनी एलआईसी में सरकारी शेयर बेचने का प्रस्ताव किया गया है। किंतु सवाल है कि संपत्ति बेचने की एक सीमा है, उसके बाद क्या? अभी तो यही कहा जा सकता है कि अंत में इन सरमायेदार परस्त नीतियों से हुये सरकारी घाटे का सारा बोझ विभिन्न तरह से आम मेहनतकश जनता के सिर पर ही लादा जाना है। स्पष्ट है कि यही नीतियाँ जारी रहीं तो देश की आम जनता को अच्छे दिनों के नाम पर अभी बहुत अधिक तकलीफदेह दिन देखने बाकी हैं।    

https://janchowk.com/pahlapanna/union-budget/

Friday, January 31, 2020

बजट - पूँजीपतियों की उम्मीदें, मेहनतकशों की 'ना'उम्मीदें

सरकार और भोंपू मीडिया की तमाम कोशिशों के बावजूद अब अर्थव्यवस्था की बदहाली पर इतनी जानकारी सार्वजनिक हो चुकी है कि अभी यह किसी विवाद का विषय ही नहीं बचा कि भारतीय पूंजीवादी अर्थव्यवस्था संकट और मंदी के गहरे भँवर में फंसी हुई है। उस बारे में कुछ और लिखने की अभी खास जरूरत नहीं। अभी कोई बहस है तो इस बात पर कि इस मंदी की वजह क्या है और सरकार इससे पार पाने के लिए क्या कदम उठा सकती है और उनके कामयाब होने की कितनी आशा की जा सकती है। इसी स्थिति में 1 फरवरी को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन वित्तीय वर्ष 2020-21 के लिए बजट प्रस्तुत करेंगी। वैसे मीडिया की खबरों में देखा ही जा रहा है कि वित्त मंत्री की बजट बनाने में एक क्लर्क से अधिक कोई भूमिका नहीं है। भोंपू मीडिया में खुद प्रतिभा के भंडार महामानव मोदी ही देश के बड़े पूँजीपतियों के साथ सलाह-मशविरा करते दिखाये गए हैं, निर्मला देवी को उसमें बुलाया तक भी नहीं गया था। इसलिए देश को नोटबंदी और जीएसटी जैसी महान योजनायें देने वाले महामानव मोदी इस बार क्या उपहार देंगे, समझदार लोग अभी से उस बारे में सोचने लगे हैं। फिर भी, बजट में सरकार के पास करने के लिए क्या विकल्प हैं और उनके संभावित प्रभाव पर एक संक्षिप्त विचार कर लेते हैं।

पूंजीवादी अर्थशास्त्री आर्थिक संकट से निकलने के दो मुख्य रास्ते सुझाते हैं, नवउदारवादी और कींसवादी। नवउदारवादी कहते हैं कि सरकार को अपने खर्च को सीमित कर अपने वित्तीय घाटे को कम करना चाहिये। इससे सरकार को कर्ज लेने की अधिक आवश्यकता नहीं रहेगी और वह उपलब्ध पूँजी के लिए निजी क्षेत्र के साथ होड नहीं करेगी। पूँजी के लिए होड के कम होने से ब्याज दरें गिर जायेंगी और निजी क्षेत्र को सस्ती ब्याज लागत पर प्रचुर पूँजी उपलब्ध होगी और वह अर्थव्यवस्था में निवेश को तेज करेगा। इससे आर्थिक वृद्धि तेज होगी, रोजगार सृजित होंगे और ट्रिकल डाउन के जरिये आर्थिक वृद्धि का लाभ आम जनता तक भी पहुँचने लगेगा। तब उपभोग और माँग में वृद्धि होकर अर्थव्यवस्था संकट से निकल कर तीव्र विकास की राह पकड़ लेगी। इसी विचार से सरकार के वित्तीय घाटे की सीमा बांधने वाले कानून बहुत देशों में बनाये गये जैसे भारत में एफ़आरबीएम एक्ट जिसके अनुसार वित्तीय घाटे को कम करने के लक्ष्य निर्धारित किए गये। इसके अनुसार अभी सरकार का वित्तीय घाटा 3% से अधिक नहीं होना चाहिये। बजट के अनुसार चालू वित्तीय वर्ष में यह 3.43% रहने का अनुमान है हालाँकि स्वतंत्र विश्लेषक मानते हैं कि सरकार इसके के बड़े हिस्से को सार्वजनिक संस्थानों के कर्ज के नाम पर छिपा रही है और वास्तविक घाटा 8-10% है। सिर्फ खाद्य निगम का ही उदाहरण लें तो सरकार ने उसके नाम पर ही बैंकों से लगभग दो लाख करोड़ रुपये का कर्ज लिया हुआ है जो बजट के आय व्यय व घाटे के हिसाब में शामिल नहीं है। इसी वजह से रिजर्व बैंक द्वारा मुद्रा नीति में 5 बार रिपो ब्याज दर घटाने के बाद भी बैंकों के वास्तविक कर्ज की औसत ब्याज दर में कोई प्रभावी कमी नहीं आई है। हाँ, सबसे बड़ी कंपनियों को अपनी अल्पकालीन जरूरत वास्ते कमर्शियल पेपर के जरिये खुद सरकार से भी कम ब्याज पर कर्ज मिल जा रहा है। पर कुछ बड़ी कंपनियों के मुनाफे बढ़ने से अर्थव्यवस्था में संकट नहीं निपटता। इससे सिर्फ इतना होगा कि इन बड़े पूँजीपतियों की संपत्ति में और वृद्धि होगी जबकि पूरा देश आर्थिक संकट झेलता रहेगा।

इसके विपरीत कींसवादी मानते हैं कि आर्थिक संकट के मौके पर सरकार को खर्च कम करने के बजाय बढ़ाना चाहिये क्योंकि संकट काल में बाजार माँग कम होने से पूँजीपति कम ब्याज पर प्रचुर पूँजी उपलब्ध होने से भी निवेश नहीं करते क्योंकि उत्पादित माल को बेचकर मुनाफा कमाना उनका मकसद है लेकिन बाजार में माँग नहीं हो तो माल बिकेगा नहीं और घाटा हो जायेगा। अतः वे सस्ते कर्ज लेकर अपने पुराने महँगे कर्ज चुकाने का रास्ता अपनाते हैं। इसलिये कींसवादी मानते हैं कि उत्पादन में पूँजी निवेश बढ़ाने का काम सरकार ही कर सकती है और उसे वित्तीय घाटे की परवाह न कर कर्ज लेकर भी ऐसा करना चाहिये। सरकार अगर खर्च बढ़ाये तो उससे बहुत से व्यक्तियों के हाथ में पैसा आयेगा और वे उसे उपभोग के लिए खर्च करेंगे। उपभोग बढ़ने से बाजार में माल की माँग बढ़ेगी। तब निजी पूँजीपति ऊँची ब्याज दर पर कर्ज लेकर भी पूँजी निवेश कर उत्पादन बढ़ाएँगे, आर्थिक वृद्धि तेज होगी एवं रोजगार सृजन अधिक होगा, जिसे माँग और बढ़कर अर्थव्यवस्था विकास के चक्र में प्रवेश कर लेगी। तेज आर्थिक वृद्धि से सरकार की टैक्स आय बढ़ेगी जिससे वह लिये गये कर्ज को चुका कर अपनी वित्तीय स्थिति को फिर से ठीक कर लेगी।

1970 के दशक से पूरी पूँजीवादी दुनिया में नवउदारवादी विचार का प्रभुत्व रहा है। भारत में भी 1980 के दशक से उदारीकरण का दौर शुरू हुआ जिसके अंतर्गत अधिकाँश पूँजीवादी देशों की तरह यहाँ भी सार्वजनिक उद्यमों में विनिवेश कर उनका निजीकरण किया गया और शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, आदि सार्वजनिक कल्याण कार्यक्रमों पर बजटीय खर्च घटा उनके व्यवसायीकरण को बढावा दिया गया। इस सबके पीछे तर्क यही था कि सरकार को पूँजीनिवेश से दूर रहकर अपना वित्तीय घाटा नियंत्रित रखना चाहिये और निजी क्षेत्र नियंत्रण मुक्त हो खूब निवेश कर आर्थिक वृद्धि को गति दे। आरंभ में इसका लाभ निजी पूँजीपतियों को ही होगा पर बाद में यह फायदे रिसते रिसते आम जनता तक भी पहुँचेंगे और गरीबी दूर होगी। इसी क्रम में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने वित्तीय घाटे पर नियंत्रण करने वाले एफआरबीएम कानून को पारित किया था।

किंतु इन नीतियों के नतीजे के तौर पर भारत में भी जल्दी ही व्यापक वित्तीय संकटों का दौर शुरू हुआ। 2008 के ऐसे ही विश्वव्यापी संकट को टालने के लिए तत्कालीन यूपीए सरकार ने अल्पकालिक तौर पर कींसवादी और नवउदारवादी नीतियों के मिश्रण को अपनाकर एक ओर मनरेगा लागू किया तो दूसरी ओर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा इंफ्रास्ट्रक्चर में पूँजी निवेश के लिए खुले हाथ भारी संख्या में कर्ज बाँटने की नीति अपनाई। पर यह नीति भी संकट को तीन साल ही टाल पाई तथा 2011 पार होते होते अर्थव्यवस्था फिर से मंदी का शिकार हो गई और इसी संकट के दौर से पैदा असंतोष का लाभ उठाकर तेज विकास के अच्छे दिन के सपने वाली मोदी सरकार सत्ता में आई।

मौजूदा मोदी सरकार सैद्धांतिक तौर पर नवउदारवादी नीतियां अपनाने के लिए कटिबद्ध थी। लेकिन इन नीतियों का नतीजा विकास के अच्छे दिनों के बजाय बढती बेरोजगारी, घटते उपभोग और मेहनतकश जनता के लिए तकलीफदेह गरीबी वाली वर्तमान आर्थिक मंदी है। सरकार और रिजर्व बैंक दोनों द्वारा ब्याज दरें घटाकर निजी पूँजी निवेश को बढाने की तमाम कोशिशों के बावजूद भी आज पूँजी निवेश में वृद्धि 1% से भी नीचे के ऐतिहासिक स्तर पर जा पहुँची है। ऐसी ही स्थिति विकसित से विकासशील सभी पूँजीवादी देशों की है। अतः नवउदारवादी आर्थिक नीतियों द्वारा तीव्र आर्थिक वृद्धि और आम जनता के जीवन में सुधार के सारे दावों का दिवालियापन पूरी तरह जाहिर हो चुका है। इसके बजाय जनता को मिली है बढ़ती गरीबी, कम होती मजदूरी, भयानक बेरोजगारी, कम होता उपभोग, नमक-चाय पत्ती-चीनी-दाल-मसालों-बिस्कुट जैसी साधारण चीजों के उपभोग में भी कटौती करने को मजबूर मेहनतकश जनता और बेरोजगारों, गरीब किसानों, खेत मजदूरों की बढ़ती आत्महत्याएं, इलाज-दावा के बगैर तड़पते-मरते बीमार!

इसके चलते अब फिर से पूँजीवादी अर्थशास्त्रियों का एक बडा हिस्सा सरकार द्वारा वित्तीय घाटे के बढने की परवाह छोड कर्ज लेकर भी भारी पूँजी निवेश द्वारा अर्थव्यवस्था में वृद्धि को किकस्टार्ट करने की वकालत करने में जुट गए हैं। हालाँकि एक हिस्से का जोर अभी भी पूँजीपति वर्ग और अमीर मध्यम वर्ग को कॉरपोरेट या इनकम टैक्स छूट और सस्ते कर्ज देकर उपभोग और निवेश बढाने पर है पर पिछली ऐसी कॉर्पोरेट टैक्स रियायतों से वास्तविकता में ऐसा कुछ भी नहीं होने से इनकी आवाज कमजोर हुई है। 
पर क्या कींसवादी नीति भी वर्तमान संकट का वास्तविक समाधान कर सकती है? यहाँ सवाल यह है कि सरकार घाटा बढाकर खर्च करेगी कहाँ? एक तरीका है ग्रामीण बेरोजगारों के लिए मनरेगा पर बजट बढाना तथा शहरी बेरोजगारों के लिए भी ऐसी ही रोजगार गारंटी आरंभ कर इन बेरोजगारों के हाथ में कुछ पैसा देकर इनका उपभोग व उसके जरिए बाजार माँग बढाने का प्रयास करना। निश्चित ही इससे तात्कालिक तौर पर इन बेरोजगार श्रमिकों को राहत मिलेगी और यह किया ही जाना चाहिए। पर इन योजनाओं से अर्थव्यवस्था में स्थाई माँग और उत्पादक शक्ति का विकास नहीं किया जा सकता। अतः तात्कालिक राहत के सिवा यह अर्थव्यवस्था के संकट का कोई स्थाई समाधान नहीं है।

दूसरा जो उपाय सुझाया जा रहा है वह है इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च को खूब बढाना। सरकार पहले ही पाँच साल में एक सौ लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च की योजना इसके लिए घोषित कर चुकी है। अगर हम इसके लिए पूँजी की व्यवस्था की बारीकी में जाये बगैर यह मान भी लें कि सरकार यह निवेश करेगी तब भी यह सोचना होगा कि बुलेट ट्रेन, मेट्रो, एक्सप्रेस वे, स्मार्ट सिटी, डिजीटलाईजेशन, जैसी विशाल योजनाओं पर होने वाले इस खर्च से क्या अर्थव्यवस्था सुधर सकती है। इन सभी योजनाओं का डिजाइन ऐसा है कि इनका उपयोग करने वाली जनता का प्रतिशत बहुत कम है जिसके चलते इन योजनाओं के द्वारा मुनाफा कमाकर बैंक कर्ज से जुटाई गई पूँजी की किश्त और ब्याज को चुकाने में बहुत शक है। दिल्ली मेट्रो में भाड़ा तेजी से बढ़ाकर जैसे ही आम जनता की पहुँच से दूर किया गया इसका घाटा और तेजी से बढ़ने लगा है। लखनऊ वगैरह की मेट्रो तो शुरू से ही इतनी महँगी हैं कि आम जनता को इनका कोई लाभ नहीं और ये शुरू से ही सफ़ेद हाथी बन गईं हैं। इसलिये अधिक संभावना यही है कि जैसे 2008-09 में यूपीए सरकार के वक्त बैंकों द्वारा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्टों के लिए बाँटे गये बडे-बड़े कर्ज बाद में डूब गये और वे कंपनियाँ दिवालिया हो गईं, उसी तरह ये नये बडे कर्ज भी बाद में एनपीए बनकर बैंकिंग प्रणाली को और भी भयंकर वित्तीय संकट में धकेल देंगे। फिर बैंकिंग प्रणाली को संकट से निकालने के नाम पर उस घाटे का सारा बोझ आम मेहनतकश जनता को ही झेलना पड़ेगा।
यही वजह है कि बजट प्रस्ताव सरकार के लिए गले की फाँस बने हुए हैं क्योंकि पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का संकट इतना गंभीर हो गया है कि नवउदारवादी हों या कींसवादी दोनों ही तरह की नीतियों से इसके स्थायी छोड़िए तात्कालिक समाधान का भी कोई वास्तविक विकल्प मुमकिन नहीं रहा है। बजट में देखने के लिए सिर्फ यह होगा कि आम जनता पर कितना बोझ किस नाम पर डाला जाता है और उसके जरिये पूंजीपति वर्ग को कितनी सुविधा दी जाती है। इसके अलावा सब बड़ी-बड़ी चमत्कारिक योजनायें भोंपू मीडिया में मोदी की तारीफ का ढ़ोल बजवाने के लिए ही होंगी, बिना किसी वास्तविक लाभ के।

Monday, January 20, 2020

जनसंख्या नियंत्रण– एक ख़तरनाक प्रस्ताव

संघ-बीजेपी के राजनीतिक प्रचार के कुछ प्रिय मुद्दों में से एक जनसंख्या में तेज वृद्धि रहा है। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने एक बार फिर जनसंख्या नियंत्रण का विषय छेड़ते हुये दो बच्चों से अधिक पर रोक लगाने की माँग से इसे गरम करने की कोशिश की है। हालाँकि आधिकारिक तौर पर संघ-बीजेपी द्वारा इस मुद्दे को सीमित संसाधनों की तुलना में बढ़ती जनसंख्या की समस्या पर नियंत्रण के रूप में रखा जाता है पर ज़मीनी स्तर के प्रचार में उसकी मशीनरी इस मुद्दे को मुसलमानों द्वारा अधिक बच्चे पैदा कर आबादी बढ़ाने और हिंदुओं के अल्पसंख्यक बन जाने के जवाब के तौर पर प्रस्तुत करती है। पर क्या भारत में जनसंख्या में विस्फोट जैसी कोई समस्या वास्तव में बची है?
जनसंख्या वृद्धि की दो मूल वजह हैं – एक, जन्म दर का अधिक होना, और दूसरे, मृत्यु दर का कम होना। जहाँ तक जन्म दर का सवाल है प्रति स्त्री 2.1 बच्चों को प्रतिस्थापन दर अर्थात जनसंख्या के स्थिर बने रहने की दर माना जाता है क्योंकि यह दर जन्म और मृत्यु की दर को समान कर देती है। जन्म दर इससे अधिक होने से जनसंख्या बढ़ती है और कम होने से घटने लगती है। अधिकांश विकसित देशों में इसके 2.1 से नीचे होने से ही जनसंख्या के गिरने और आबादी में वृद्धों का अनुपात बढ़ते जाने की समस्या पैदा हुई है।
जहाँ तक मृत्यु दर का सवाल है वह बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में निरंतर घटती रही है क्योंकि आर्थिक विकास तथा बेहतर वैज्ञानिक स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता से औसत जीवन आयु बढ़ रही थी। लेकिन पिछले वैश्विक आर्थिक संकट के बाद से अधिकांश पूंजीवादी देशों ने नवउदारवादी नीतियों और बुजुर्गों के लिये स्वास्थ्य सेवाओं और पेंशन जैसे सामाजिक कल्याण के कार्यक्रमों पर खर्च में कटौती की जो नीति अपनाई है उसकी वजह से यह स्थिति बदल ही नहीं गई है, बल्कि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे कुछ देशों में हाल में औसत जीवन आयु घटने से मृत्यु दर फिर से बढ़ने लगी है। यही वजह है कि कई देशों में जनसंख्या वृद्धि नहीं बल्कि उसमें कमी की समस्या उठ खड़ी हुई है।

जहाँ तक भारत का सवाल है उसमें 1970 के दशक में एक और उच्च जन्म दर, दूसरी और साथ ही औसत जीवन आयु के बढ़ने से जनसंख्या वृद्धि की गति में भारी विस्फोट हुआ था। किंतु इसके बाद जन्म दर में कमी होनी शुरू हो गई क्योंकि मृत्य दर कम होकर औसत जीवन आयु बढ़ने और शिक्षा के प्रसार से अधिक बच्चों को जन्म देने की प्रवृत्ति कम हो जाती है। 1971 में जहाँ जन्म दर 5.5 थी, 2016 में वह 2.4 से भी कम हो गई और जिस तेजी से यह गिर रही है उससे अनुमान है कि एक-दो साल में ही यह पूरे देश के औसत में 2.1 पर या उससे नीचे आ जायेगी। अब यह सिर्फ उत्तर भारत के कुछ राज्यों में ही 2.1 से ऊपर रह गई (बिहार में सबसे अधिक 3.41) लेकिन वहाँ भी अब यह तेजी से गिर रही है। अन्य कई क्षेत्रों में यह पहले ही 2 से भी कम के स्तर पर आ चुकी है। अतः जन्म दर का उच्च होना अब भारत में जनसंख्या वृद्धि का प्रमुख कारण नहीं है।
इसी की पुष्टि दूसरी तरह जनसंख्या में 14 वर्ष की उम्र तक के बच्चों के अनुपात से भी होती है। 1975 में कुल जनसंख्या में इनका अनुपात 40% से अधिक था किंतु 2015 में यह 30% के नीचे आ गया अर्थात भारत की आबादी की औसत जीवन आयु बढ़ रही है और उसमें बच्चों का अनुपात घटने लगा है। अभी भारत में युवा और बुजुर्ग आबादी का प्रतिशत बढ़ रहा है। जैसे जैसे समय गुजरता जायेगा, बुजुर्गों का प्रतिशत अधिक होता जायेगा।

भारत में अब जनसंख्या के बढ़ने का मुख्य कारण औसत जीवन आयु दर में वृद्धि है जो 1971 में 50 वर्ष थी और तब से बेहतर चिकित्सा सुविधाओं और भोजन की बेहतर उपलब्धता की वजह से बढ़कर अब 68 वर्ष तक पहुँच चुकी है। इससे मृत्यु दर में हुई गिरावट के कारण अभी तक भारत में जनसंख्या वृद्धि दर अपेक्षाकृत रूप से ऊँची रही है। किंतु यहाँ भी अगर हम विकसित देशों का उदाहरण लें तो भविष्य में औसत जीवन आयु में वृद्धि की संभावना बहुत सीमित हो गई है क्योंकि एक और तो आर्थिक विकास की गति मंद पड़ी है, दूसरी ओर भारत में भी नवउदारवादी नीतियों के अपनाए जाने से एक तो हाल के वर्षों में प्रति व्यक्ति भोजन उपलब्धता और उपभोग घटने लगा है।
दूसरी और स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण बहुत तेजी से हो रहा है और ये बहुत महँगी होकर अधिकांश जनता की पहुँच से बाहर होती जा रही हैं। अतः अगर औसत जीवन आयु में गिरावट भी न हो तो अब इसमें वृद्धि की भी अधिक गुंजाइश नहीं बची है। अतः अब मृत्यु दर में और कमी होने की संभावना बहुत न्यून हो चुकी है और यह कमोबेश स्थिर हो जायेगी। अतः जनसंख्या वृद्धि दर अधिक होने का यह कारण भी समाप्त हो जायेगा।
ये दोनों कारक बताते हैं कि भारत में जनसंख्या वृद्धि की दर जल्द ही गिरकर शून्य पर पहुँच जाने वाली है जिससे जनसंख्या पहले स्थिर होगी और उसके बाद भी अगर जन्म दर घटती रही तो इसमें गिरावट भी आरंभ हो सकती है। यह तो निश्चित है कि कुल आबादी में बच्चों और युवाओं का अनुपात गिरकर बुजुर्गों का अनुपात बढ़ने लगेगा। यह भारत की अर्थव्यवस्था के लिये नकारात्मक स्थिति होगी क्योंकि इससे सामाजिक सुरक्षा सुविधाओं की कम आवश्यकता वाली उत्पादक आयु की आबादी कम होगी और सामाजिक सुरक्षा सुविधाओं की अधिक जरूरत वाली बुजुर्ग आबादी बढ़ जायेगी।
भारत जैसे देश में जहाँ अधिकांश आबादी असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है या स्वयं रोजगार से जुड़ी है और उनके पास रिटायरमेंट पश्चात पेंशन जैसी सामाजिक सुरक्षा का नितांत अभाव होने से अपने बच्चों पर काफी निर्भरता होती है, वहाँ युवाओं की तुलना में बुजुर्गों की अधिक आबादी भविष्य में एक भयंकर समस्या का जन्म दे सकती है।
साथ ही यह भी तथ्य है कि स्वाभाविक सामाजिक गति के बजाय कानूनी प्रावधानों से किए परिवर्तन अपने साथ कई दुष्परिणाम भी लेकर आते हैं। भारत में दो बच्चों से अधिक पर कानूनी रोक का एक खतरनाक पहलू यह होगा कि सांस्कृतिक कारणों से पहले ही बेटे की चाह में कन्या भ्रूण हत्या की उच्च दर से जूझ रहे समाज में बेटे की चाह और भी मजबूत होगी तथा कन्या भ्रूण हत्या की प्रवृत्ति को बल मिलेगा जो भारतीय समाज में पुरुष-स्त्री अनुपात की पहले से ही नाजुक स्थिति को भयावह बना देगा। यह भारतीय समाज में मौजूद प्रतिक्रियावादी प्रवृत्तियों को और भी बल देगा और स्त्रियों के साथ होने वाले अपराधों को भी बढ़ा देगा। इसलिए जब जनसंख्या वृद्धि की संभावना स्वयं ही समाप्त होने की और है बच्चों के जन्म पर कानूनी नियंत्रण हमारे समाज के लिए कई जोखिम पैदा कर सकता है।

https://hindi.newsclick.in/Population-Control-A-Dangerous-Proposal
20-01-2020