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Financial Crisis In India - Brief Study

Monday, December 2, 2019

बैंकों में बढ़ते संकट की वजह क्या है?

बैंकों में बढ़ते संकट की वजह क्या है?

भारतीय बैंकिंग व्यवस्था में बढ़ते संकट का सबसे बड़ा लक्षण है कि खुद रिजर्व बैंक को एक सप्ताह में दूसरी बार बयान देकर कहना पड़ा है कि देश की बैंकिंग व्यवस्था बहुत मजबूत है और जनता बैंकों में संकट की किसी अफवाह पर भरोसा न करे।

स्पष्ट है कि पहले सार्वजनिक बैंकों की कमजोर स्थिति व नीरव मोदी, मेहुल चोकसी तथा अन्य कई बड़े सरमायेदारों द्वारा हजारों करोड़ रुपये के कर्ज लेकर देश से भाग जाने के बाद अब पंजाब और महाराष्ट्र बैंक, लक्ष्मी विलास बैंक व यस बैंक के हालिया घटनाक्रम व आने वाले दिनों में बैंकों व गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के कर्जों की वसूली में संकट बढ़ने की आशंका से अब अपनी बचत इन बैंकों में रखने वालों में घबराहट बढ़ रही है।

आम तौर पर मीडिया जगत में इस घटनाक्रम को बढ़ते फ्रॉड, गबन और जालसाजी के रूप में चित्रित किया गया है। यह सही भी है कि वित्तीय क्षेत्र में गबन की संख्या और उसके परिमाण में भारी वृद्धि हुई है। खुद रिजर्व बैंक द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2016-17 में बैंकों में 24 हजार करोड़ रुपये, 2017-18 में 41 हजार करोड़ रुपये, 2018-19 में 71 हजार करोड़ रुपये के गबन हुए थे।

मगर चालू वित्तीय साल के तो पहले तीन महीनों (अप्रैल-जून) में ही गबन की रकम बढ़कर 31,898 करोड़ रुपये जा पहुंची है। साथ ही यह मामले सिर्फ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों तक ही सीमित नहीं हैं। हालांकि निजी बैंक नकारात्मक खबरों के प्रचार-प्रसार को रोकने में ज्यादा माहिर हैं, फिर भी पिछले एक साल में सबसे बड़े निजी बैंकों - एचडीएफसी, आईसीआईसीआई और एक्सिस बैंक समेत निजी क्षेत्र के बैंकों द्वारा डूबे कर्जों को छिपाने, गबन और ग्राहकों के साथ धोखाधड़ी के बहुत सारे मामले सामने आ चुके हैं।

लेकिन मामला सिर्फ इतना ही नहीं हैं। एक और क़िस्म का भी गबन है जिसे करने वाले को विलफुल डिफाल्टर अर्थात इरादतन गबनकर्त्ता कहा जाता है। रिजर्व बैंक ने कर्ज न चुकाने वालों में भी यह एक खास श्रेणी बनाई है जिसमें बैंक मज़बूरीवश तभी किसी को डालते हैं जब कर्ज लेने वाला खुद ही आत्महंता कदम उठा कर उनके सामने कोई और विकल्प ही न छोड़े।

इसका मतलब यह प्रमाणित और जगजाहिर हो चुका है कि उसने लिए हुए कर्ज का गबन कर लिया, चुकाने की हैसियत है, फिर भी इरादतन नहीं चुकाता। 30 सितम्बर 2017 को ही ऐसे इरादतन गबन की रकम बढ़कर 1 लाख 11 हजार 739 करोड़ पहुंच चुकी थी।

लेकिन क्या वास्तव में इन मामलों को गबन कह देना सही है? गबन कहने से ऐसा आभास होता है जैसे कि यह बैंकिंग प्रबंधन की कमजोरियों का फायदा उठाकर कुछ जालसाजों-गबनकर्ताओं द्वारा किये गये अपराध हैं जिसके खिलाफ सरकार, बैंकिंग और पुलिस-न्याय व्यवस्था जांच और सजा के लिए कदम उठा रही है।

वित्त और अन्य मंत्री, प्रशासक भी यही बयान दे रहे हैं कि रिज़र्व बैंक तथा अन्य संस्थाओं के नियामकों, प्रबंधकों, ऑडिटरों की लापरवाही या मिलीभगत से ये अपराध हुए हैं और अब इनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा रही है। परंतु सारी प्रणाली और घटनाक्रम पर ध्यान दें तो वास्तव में ऐसा नहीं है।

पहली बात तो यह कि यह सब बैंकों, सीबीआई, रिजर्व बैंक, सरकार को आज से नहीं बल्कि बहुत पहले से मालूम था। जैसे पीएमसी बैंक के मामले में सभी को पहले से मालूम था कि क्या चल रहा है और रिजर्व बैंक खुद बैंक के निदेशक मंडल को आगाह कर चुका था, मगर उसके द्वारा कोई कदम न उठाने पर भी उसने कोई सख्त कार्रवाई नहीं की।

अन्य सभी मामलों में भी ऐसी ही सूचनाएं हैं कि यह सब वर्षों से बैंक, रिजर्व बैंक, सीबीआई, सरकार तक सबकी जानकारी और सहमति से जारी था लेकिन जब मोदी, चौकसी, माल्या, मेहता, जैसे पूंजीपति विदेश भाग गए या रकम विदेश या देश में ही ठिकाने लगाई जा चुकी, सुबूत नष्ट किये जा चुके तो फिर इन्हें गबन घोषित कर कार्रवाई की नौटंकी जारी है।

दूसरी बात यह कि ये तो वह मामले हैं जहां खुद कर्ज लेने वालों ने भागकर सब वैकल्पिक रास्ते बंद कर लिए अन्यथा भूषण, एस्सार, वीडियोकॉन, यूनिटेक आदि तमाम पूंजीपति इनसे भी बड़ी रकमें दबाकर आराम से भारत में ही मौजूद हैं, उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की जाती है, उन्हें कोई गबन भी घोषित नहीं करता, बल्कि वे पहली कंपनियों को 'बीमार' बनाकर, नए कारोबार शुरू कर खुद अपनी सेहत और दौलत को और ऊंचाइयों पर पहुंचा रहे हैं।

किंतु बढ़ते गबन के ये सारे आंकड़े मिलकर भी भारतीय बैंकिंग व्यवस्था के वर्तमान भयावह संकट की व्याख्या नहीं कर सकते। बैंकिंग उद्योग में वर्तमान संकट की वजहों को समझने के लिए पहले हमें अर्थव्यवस्था में बैंकों की भूमिका को जानना आवश्यक है। बैंक मानव उपभोग लायक कुछ भी उत्पादित नहीं करते। पहले उनका मुख्य काम सिर्फ व्यापारिक गतिविधियों की विभिन्न पार्टियों के बीच तय शर्तों और वक्त पर सही भुगतान सुनिश्चित करना और इसका सही हिसाब रखना था।

साथ ही जिनके पास अतिरिक्त धन हो बैंक उसे सुरक्षित जमा रखने और जरूरत के वक्त भुगतान का कार्य भी करते थे। इस उपलब्ध धन को बैंक व्यावसायिक गतिविधियों हेतु लघु अवधि के लिए कर्ज के तौर पर भी देते थे। लेकिन पूंजीपतियों के बीच कम लागत पर अधिकतम उत्पादन और बाजार में प्रभुत्व की प्रतिद्वंद्विता में चल-अचल पूंजी में निवेश की जरूरत लगातार बढ़ने के चलते, पूंजीपतियों को शेयर पूंजी में निवेश, कर्ज, भुगतान गारंटियों, आदि के रूप में पूंजी उपलब्ध कराने में बैंकों की भूमिका बढ़ती गई।

अपनी उपरोक्त वर्णित भूमिकाओं से पूंजी की बड़ी मात्रा की उपलब्धता वाले बैंकों ने उद्योग-व्यापार में मध्यस्थता से आगे बढ़कर पूरी अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण कायम कर लिया है क्योंकि अब वही पूंजीपति प्रतिद्वंद्विता में टिके और आगे बढ़ते रह सकते हैं जिन्हें बैंकों के द्वारा निरंतर बढ़ती मात्रा में पूंजी की उपलब्धता सुनिश्चित हो।

इसके एवज में श्रमिकों की श्रम शक्ति द्वारा उत्पादित और पूंजीपतियों द्वारा हस्तगत अधिशेष मूल्य का एक बड़ा भाग बैंकों को प्राप्त होता है। इससे उनकी पूंजी लगातार विशालकाय होती गई है।

एकाधिकार पूंजीवाद के युग में तो बढ़ते मुनाफे की हवस में इन्होने पूरी अर्थव्यवस्था को अपने जुए का अड्डा बना दिया है। लेकिन इस जुए में उनकी जीत होने पर तो मेहनतकश जनता की जेब कटती ही है, किसी दांव में उनके हारने पर भी हानि की वह रकम उनकी सेवक पूंजीवादी सरकारें विभिन्न तरह से जनता की जेब से ही वसूल कर उसकी भरपाई करती है।

अब मरणासन्न पूंजीवाद के संकट के दौर में तो दुनिया भर में बैंकों के बारे में सिद्धांत ही बन गया है - Too big to fail, too big to jail. अर्थात बैंक इतने शक्तिशाली हैं कि कोई पूंजीवादी सरकार उन्हें डूबने देने की हिम्मत नहीं कर सकती; और उनके मालिकों/शीर्ष प्रबंधकों को किसी भी जुर्म में सजा भी नहीं दे सकतीं।

आज भारत में बैंकिंग उद्योग के संकट की तस्वीर भी पूरी तरह ऐसी ही है। सिर्फ उदारीकरण के पिछले 25 वर्षों के इतिहास को ही देखा जाये तो बैंक बीसियों लाख करोड़ रुपये कॉर्पोरेट सेक्टर को दिए कर्जों में डुबा चुके हैं ।

कितने पूंजीपति इन कर्जों के बल पर ही खरबों की संपत्ति के मालिक बन गए हैं। पर कर्ज न चुकाने के कारण इनमें से किसी सरमायेदार, सेठ-महाजन का आज तक कुछ न बिगड़ा, बल्कि उनके पास और दौलत इकट्ठी होती गई।

स्पष्ट है कि इस बड़ी मात्रा में डूबे कर्जों और गबन की परिघटना को न तो निजी-सरकारी बैंकों के अंतर के आधार पर समझा जा सकता है, न ही कांग्रेस-बीजेपी की नीतियों में भेद के आधार पर, और न ही इन्हें कुछ अपराधियों द्वारा किये गए गबन कहकर।

इसे समझने के लिए हमें वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था में बैंक, बीमा, आदि वित्तीय क्षेत्र और उद्योग-व्यापार क्षेत्र के पूंजीपतियों के परस्पर संबंधों को समझना चाहिए।

पूंजीवादी व्यवस्था में प्रत्येक पूंजीपति को प्रतिद्वंद्विता में टिके रहने, अधिक से अधिक बाजार हासिल करने और अपना अधिकतम मुनाफा सुनिश्चित करने के लिए निरंतर अधिक से अधिक चल-अचल पूंजी के निवेश की आवश्यकता होती है।

आज एक ओर तो उत्पादन के प्रत्येक क्षेत्र में पहले ही पूंजी की जकड़बंदी होने से बाजार के विस्तार की संभावनाएं बहुत सीमित हो चुकी हैं, दूसरी ओर हर उद्योग में कुछ पूंजीपतियों का एकाधिकार कायम हो चुका है। इसलिए दूसरे को पछाड़कर आगे बढ़ने की यह होड़ अत्यंत गलाकाट हो चुकी है। इसलिए सभी पूंजीपतियों के लिए वित्तीय पूंजीपतियों से अधिकाधिक पूंजी प्राप्त कर अपने कारोबार को निरंतर विस्तारित करने का दबाव हमेशा बना रहता है।

फिर स्वयं बैंक, बीमा, आदि वित्तीय पूंजीपतियों में भी एकाधिकार की होड़ है और उन्हें भी आवश्यकता रहती है कि वे अपना बाजार हिस्सा बढ़ाने हेतु ज्यादा से ज्यादा कारोबारियों का वित्तीय पोषण कर उनके द्वारा हस्तगत अधिशेष में अपनी हिस्सेदारी और मुनाफा सुनिश्चित करें।

दोनों का यह परस्पर हित सुनिश्चित करता है कि बैंक उद्योग-व्यापार की अधिक से अधिक कंपनियों को लगातार कर्ज और निवेश के विभिन्न रूपों में अधिकाधिक वित्तपोषण करते रहें।
इस प्रक्रिया को नीरव मोदी के कारोबार के उदाहरण के जरिये अच्छे से समझा जा सकता है।

मोदी की तीनों कंपनियों में उसकी अपनी कुल जमा पूंजी मात्र 400 करोड़ रुपये थी। बैंकों ने उसे 3992 करोड़ का कर्ज दिया हुआ था, ऊपर से अब तक 13 हजार करोड़ से अधिक के एलओयू सामने आये हैं। रायटर्स के मुताबिक कुल 20 हजार करोड़ उसे 'सरकारी' बैंकों ने दिया था, जिसके बल पर उसका सारा व्यापार, दौलत खड़ी हुई थी।

उसकी कंपनियां इस वित्तीय पूंजी के सहारे ही तेजी से विस्तार कर रही थीं और वह दुनिया भर के देशों में अपने नए-नए स्टोर खोल रहा था। वास्तविकता यह है कि उसने कभी कोई कर्ज वापस नहीं किया। बल्कि वह हर बार पहले से बड़ा कर्ज लेता था, जिससे पिछले कर्ज को जमा दिखाया जाता था।

इसके बल पर ही वह बड़ा पूंजीपति बना था; इस पूंजी से ही उसका मुनाफा आता था और बैंकों को रुपये तथा विदेशी मुद्रा के कर्ज पर ब्याज तथा एलओयू आदि पर कमीशन मिलता था। यह चक्र जब तक चला तब तक सब सामान्य था, जब टूटा तो इसे गबन का नाम दिया जा रहा है। यही हाल अन्य पूंजीपतियों का भी है।

यहां बैंकों की कार्यविधि की कुछ समझ भी जरूरी है। बैंक मुख्यतया दो किस्म के कारोबारी कर्ज देते हैं। एक नया कारखाना लगाने, विस्तार करने, उन्नत तकनीक और मशीनें लगाने आदि बड़े निर्माण में स्थाई निवेश के लिए दिए गए कर्ज निश्चित अवधि के होते हैं जिन्हें मासिक, त्रैमासिक, छमाही, सालाना, आदि अंतराल पर मूल व ब्याज की किश्तों में चुकाना होता है।

दूसरे, उत्पादन के लिए सामग्री, श्रम शक्ति खरीदने, उत्पादित माल के भंडारण और उत्पादक और उपभोक्ता के बीच मध्यस्थ व्यापारियों से माल का भुगतान आने तक उधार देने के लिए बैंक नकद उधार, ओवरड्राफ्ट, गारंटी, लेटर ऑफ़ क्रेडिट, लेटर  अंडरटेकिंग, पैकिंग क्रेडिट, बिल डिस्कॉउंटिंग, आदि कई रूपों में कारोबारी कर्ज देते हैं, जो कहने के लिए तो 3, 6, 9 महीने या एक-डेढ़ साल में चुकाने होते हैं पर कभी चुकाए नहीं जाते, बस ब्याज चुका दिया जाता है, वह भी अक्सर अगला कर्ज और बड़ी रकम का लेकर।

इसी पूंजी के बल पर सभी पूंजीपति अपने उत्पादन और कारोबार का विस्तार करते रहते हैं, दूसरे पूंजीपतियों से प्रतिद्वंद्विता करते हैं। पर पूंजीवादी व्यवस्था के अनिवार्य नियम से सभी पूंजीपतियों द्वारा किया जाने वाला यह निरंतर विस्तार हर कुछ वर्ष में 'अति-उत्पादन' का संकट पैदा करता है क्योंकि अधिकांश जनता की क्रय क्षमता सीमित होने से उत्पादन बाजार मांग से अधिक हो जाता है।

तब उद्योगों में नया निवेश बंद हो जाता है, पूंजीगत मालों की मांग खास तौर पर नीचे आ जाती है। इस स्थिति में इन विस्तार करते पूंजीपतियों में से कुछ के लिए यह चक्र टूट जाता है, वे दिवालिया हो जाते हैं, उद्योगों की कब्रगाह में उन्हें दफना दिया जाता है और उनके लिए हुए कर्ज एनपीए, विलफुल डिफाल्टर, गबन, आदि के रूप में सामने आते हैं।

साथ ही कभी-कभी विभिन्न कारणों से किसी बैंक द्वारा किसी पूंजीपति को नया कर्ज नहीं मिले तब भी उसका कारोबार तबाह हो जाता है, कर्ज डूब जाता है। इसलिए बैंकिंग उद्योग का संकट असल में पूंजीवादी व्यवस्था के अन्तर्निहित संकट को ही प्रतिबिंबित करता है।

पिछले 4 साल में सामने आये बैंक कर्ज संकट को भी इसी परिप्रेक्ष्य में समझा जा सकता है। 1991-92 में आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत के समय भारतीय अर्थव्यवस्था में बैंक कर्ज की कुल मात्रा उस समय के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की 19% थी। इसके बाद के पहले दशक 2001-02 तक यह बढ़कर 25% हो गई। लेकिन उसके बाद 2003 से 2008 तक जो एक अस्थाई वृद्धि का दौर चला उसमें बैंक कर्ज की मात्रा तेजी से बढ़ लगभग दोगुनी हो गई।

अर्थात इस आर्थिक विस्तार के मूल में बैंकों द्वारा औद्योगिक-व्यापारिक पूंजीपतियों को दिए गए भारी कर्ज थे। इसके बाद जब वैश्विक आर्थिक संकट शुरू हुआ तो भारत में इसके प्रभाव को टालने के लिए और अधिक बैंक कर्ज दिए गए।

इस तरह कुल बैंक कर्ज की मात्रा बढ़कर जीडीपी का 52% हो गई जबकि इस दौरान जीडीपी की संख्या में भी बड़ी वृद्धि हुई थी।  लेकिन बाजार संकट के प्रभाव को अधिक वक्त तक नहीं टाला जा सका और पूंजीपतियों की लाभप्रदता में 2011-12 के साल से तेज गिरावट आनी शुरू हो गई।

2008 में जहां पूरी अर्थव्यवस्था में लाभ की दर जीडीपी का 7% थी, 2017 तक आते-आते यह घटकर 4% से कम हो गई। परिणामस्वरूप 2013-14 का वर्ष आते-आते बहुत से पूंजीपतियों के लिए कर्ज की किश्तें छोड़िये ब्याज की रकम चुकाना भी मुश्किल हो गया। उसका नतीजा ही पिछले वर्षों में डूबते कर्जों और राइट ऑफ की रकम में भारी वृद्धि है।

इसी स्थिति को संभालने और तबाह हुए पूंजीपतियों की कंपनियों को बंद करने या बचे हुए पूंजीपतियों के स्वामित्व में स्थानांतरित करने के लिए दिवालिया अधिनियम भी लाना पड़ा है। लेकिन इसमें भी अभी तक जो मामले गए हैं उनमें बैंकों के कर्ज का औसतन 70-80% अंतिम रूप से डूब जा रहा है जिसे 'मुंडन' या हेअरकट कहा जाता है।

बैंकिंग क्षेत्र में संकट का मूल कारण पूंजीवादी आर्थिक व्यवस्था का उपरोक्त वर्णित संकट है। किंतु जब इसकी वजह से कोई बैंक संकट में आ जाता है तो सरकार व रिजर्व बैंक क्या करते हैं?

एक तार्किक न्यायपूर्ण व्यवस्था में उनका पहला काम बैंक के मालिकों-निदेशक मंडल व कर्ज दबाने वाली कंपनी व उसके मालिकों/निदेशकों की संपत्ति को जब्त करना, उन्हें भागने से रोकना होना चाहिये। लेकिन रिजर्व बैंक की नजर में अपराधी वे नहीं, बैंकों के 90% छोटे जमाकर्ता होते हैं और रोक उनके द्वारा अपने खाते में रखी गई छोटी रक़में होती हों जो उनके मुश्किल वक्त में काम आने के लिए उन्होने रखी होती है, रिजर्व बैंक सबसे पहले उस पर रोक लगाता है।

पीएमसी बैंक के मामले में तो यह भी खबर है कि बैंक के निदेशकों व उनके करीबियों द्वारा बैंक के डूबने की जानकारी होने की वजह से 15 सितंबर से अपनी रकम निकालनी शुरू कर दी गई थी, जब इन लोगों ने अपनी रकम निकाल ली तब 23 सितंबर को रिजर्व बैंक ने आम जमाकर्ताओं द्वारा निकासी पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

ऐसी खबरों के चलते आम लोगों में अपनी बचत की सुरक्षा को लेकर घबराहट फैलना स्वाभाविक ही है। साथ ही सरकार नोटबंदी के द्वारा नकद रखने पर भी अप्रत्यक्ष रोक लगा चुकी है।

अतः आशंका और डर और भी अधिक है जिससे संकट एक सामाजिक चर्चा का रूप ले चुका है। इसी वजह से मजबूर होकर रिजर्व बैंक को अफवाहों पर भरोसा न करने के बयान देने पर विवश होना पड़ रहा है।

https://hindi.newsclick.in/indian-banking-system-reserve-bank-of-india-npa-PMC-Bank-crisis
03/10/2019

ब्याज दरों में कमी आर्थिक संकट का समाधान नहीं

गत एक वर्ष में रिजर्व बैंक ने 5 बार में ब्याज दर में कुल 1.35% की कटौती की है। साथ ही आगे और कटौती का इशारा करते हुये कह दिया है कि जब तक जरूरत हो ब्याज दरों में कटौती का सिलसिला जारी रहेगा। यह वह ब्याज दर है जिस पर रिजर्व बैंक व्यावसायिक बैंकों को उधार देता है। साथ ही रिजर्व बैंक ने यह भी कहा कि बैंकों को उधार देने में अपने हाथ खुले रखेगा। गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों में जारी संकट से वित्तीय व्यवस्था को बचाने के लिये भी सभी जरूरी कदम उठाने का भी भरोसा दिया गया है। उधर यूरोपीय केंद्रीय बैंक व अमेरिकी फेडरल रिजर्व भी ब्याज दर घटाने की शृंखला जारी रखे हुये हैं।

जब भी कहीं आर्थिक संकट होता है पूंजीपति वर्ग की सबसे बड़ी माँग दो ही होती हैं। एक, ब्याज दर कम करना और दो, इस सस्ती ब्याज दर पर भारी मात्रा में नकदी उपलब्ध कराना। इसके पीछे तर्क है कि सस्ते ब्याज पर खूब कर्ज मिलने से व्यवसायी पूंजी निवेश बढ़ाएंगे, जिससे रोजगार सृजन होगा। फिर सस्ते ब्याज वाले कर्ज और जमा पर कम ब्याज मिलने से उपभोक्ता भी पैसा बैंक में रखने के बजाय उपभोग बढ़ाएंगे तथा कर्ज लेकर घर, कार, उपभोक्ता माल खरीदेंगे। इससे माँग का विस्तार होकर अर्थव्यवस्था में उछाल आयेगा। पर क्या वास्तव में ऐसा होता है?

इसको सही से समझने के लिये पहले पूंजीवादी व्यवस्था में बैंक कर्ज से जुटाई पूंजी की भूमिका को समझना बेहद जरूरी है। दरअसल आज कोई भी व्यवसाय बैंक पूंजी के पृष्ठपोषण के बिना विस्तार नहीं कर सकता, बहुत से लोगों से शेयर पूंजी जुटाने वाली जाइंट स्टॉक कंपनियाँ भी नहीं - रिलायंस जैसी कंपनी का टेलीकॉम और खुदरा क्षेत्र में विस्तार भी बैंक पूंजी की मदद से ही हो रहा है और पिछले वित्तीय वर्ष में ही उसने 67 हजार करोड़ रु नया कर्ज लिया है।

पर बैंक यह काम कैसे करते हैं? एक, वे पहले उद्योग में लगने वाली स्थायी पूंजी के लिये कर्ज देते हैं जिससे जमीन-इमारत बनती है, मशीनें खरीदी जाती हैं, उत्पादन में प्रयुक्त कच्चे माल और श्रम शक्ति के लिये शुरुआती अग्रिम मिलता है। फिर उत्पादन क्रम को गतिशील बनाये रखने के लिये चालू पूंजी (working capital) देते हैं। तीसरे, बना माल बाजार पहुँच सके इसके लिये डीलरों-दुकानदारों को व्यापारिक पूंजी देते हैं। चौथे, माल खरीदने के लिये उपभोग ऋण (कार, बाइक, टीवी-फ्रिज से शुरू कर शादी-बीमारी, कॉलेज डिग्री और टूर पैकेज तक सब कुछ खरीदने के लिये मासिक किश्तों पर कर्ज उपलब्ध है!) फिर, शेयर, जिंस और जमीन-मकान में सट्टेबाजी भी बैंक कर्ज से ही चलती है।

अगर बैंक पूंजी की उपलब्धता किसी भी कदम पर कम हो तो पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को चलाने वाला खरीद-बिक्री का चक्का थम जाता है। पहले बैंकों, अब गैर बैंक वित्तीय कंपनियों के डूबते कर्जों की वजह से यही हो रहा था। इसके लिये एक और तो सरकार लगातार सरकारी बैंकों में पूंजी झोंक रही है; दूसरी ओर, रिजर्व बैंक उन्हें सस्ते ब्याज पर फंड उपलब्ध करा रहा है। डॉलर स्वैप और सरकारी प्रतिभूति खरीद के जरिये यह काम पहले भी जारी था, अब और तेज होगा। पर क्या इससे अर्थव्यवस्था का संकट सुलझेगा? उसके लिये इसके और पक्ष भी समझने होंगे।

बैंक उद्योगों को पूंजी क्यों देता है? पहले एक सरल उदाहरण से बैंक का व्यवसाय समझते हैं। मान लें बैंक की अपनी पूंजी 10 हजार रु है, 90 हजार रु वह जमा राशि से जुटाता है। जमा पर औसत ब्याज 7% है। इस एक लाख को कर्ज देकर उसे औसत 10% ब्याज मिलता है तो उसकी बचत 3700 रु हुई। अगर इसमें कामकाज का खर्च 1700 रु मान लें तो उसे 2000 रु बचे। लेकिन क्या उसकी मुनाफा दर 2% ही है? नहीं। क्योंकि उसकी अपनी पूंजी तो 10 हजार ही है अर्थात 20% मुनाफा। यहाँ सरलता के लिए हमने शुल्क की आमदनी तथा डूबे कर्ज होने वाली से हानि दोनों को गणना से बाहर छोड़ दिया है।

लेकिन उद्योग मालिक कर्ज पर ब्याज कहाँ से देता है? अर्थव्यवस्था में नया मूल्य सिर्फ उत्पादन प्रक्रिया में जुड़ता है और उसे जोड़ता है उत्पादन में लगा श्रम। मानव श्रमशक्ति का ही गुण है कि उसके खुद के उत्पादन अर्थात जीवनयापन में जितना खर्च आता है वह उससे अधिक मूल्य उत्पादित कर सकता है। पूंजीपति श्रमशक्ति को उसके जीवनयापन के न्यूनतम खर्च पर खरीदता है और उससे अधिकतम काम कराकर उस से अधिक मूल्य पैदा कराता है। यही अतिरिक्त या अधिशेष या बेशी मूल्य सारी धन-दौलत का मूल है। यह अधिशेष मूल्य कहाँ जाता है? मालिक का मुनाफा, बैंक का ब्याज, जमीन-मकान का भाड़ा, माल बेचने वाले व्यापारी का कमीशन, यातायात का मालभाड़ा, उत्पादन के अतिरिक्त वाले कर्मचारियों का वेतन, सरकार को मिलने वाले टैक्स - ये सब इसका ही हिस्सा हैं।

लेकिन इस बँटवारे के पहले जरूरी है कि उत्पादन में पैदा यह अधिशेष मूल्य बिक्री के जरिये मुद्रा या रुपये में बदल लिया जाये। अगर बड़े बैंक कर्ज से उद्योग में लगी भारी पूंजी से बढ़ाया गया उत्पादन बाजार में पूरा न बिक पाये, क्योंकि बहुत से पूँजीपतियों ने ऐसा ही किया है, तब अति-उत्पादन का संकट पैदा हो जाता है।
अनबिके माल से बाजार अटने लगते हैं, कारखाने बंद होने लगते हैं। माल अगर बिका नहीं, तो अधिशेष मूल्य मुद्रा में बदला नहीं! मुद्रा में बदला नहीं तो मुनाफा गिर गया! बैंक का ब्याज कहाँ से आए? यहीं से बैंकों का कर्ज डूबता है। उद्योग सरकार से राहत मांगते हैं। इनमें से एक राहत है ब्याज दर कम करना - उद्योग को मुनाफा कम है तो पूंजी अग्रिम देने वालों को भी कम ब्याज ही दे सकता है। तब बैंक क्या करेगा? अपने जमा कर्ताओं को ब्याज कम देगा, क्योंकि जमा पर मिलने वाला ब्याज अंत में उद्योग में लगी श्रम शक्ति की लूट से ही आता है।

नवउदारीकरण के दौर में बैंक ऋणों में विस्तार,उद्योगों में भारी पूंजी निवेश, रोजगार सृजन में कमी, मुनाफा दर में गिरावट, ब्याज दरों के इसी तरह कम होते जाने का इतिहास है। 25 साल पहले भारत में कर्ज पर ब्याज दर 16-20% और जमा पर 12-14% थी। अब औसतन 10% व 6% है। जापान में तो ब्याज दरें पिछले 20 वर्षों से शून्य से नीचे हैं किंतु उसकी अर्थव्यवस्था में मंदी आजतक समाप्त ही नहीं हुई। यूरोप-अमेरिका में भी कई देशों में शून्य से नीचे या अधिकतम 2% तक हैं। आर्थिक संकटग्रस्त ग्रीस में 10 वर्षीय राजकीय बॉन्ड पर ब्याज दर 1.5% है जबकि भारत में 6.71%, किंतु ग्रीस अर्थव्यवस्था का संकट दूर नहीं हुआ।

वास्तविकता यह है कि जब तक बाजार में माँग न हो और उद्योग स्थापित उत्पादन क्षमता से भी नीचे काम कर रहे हों, जैसा अभी भारत में हो रहा है, तो वे सस्ता कर्ज लेकर भी पूंजी निवेश नहीं कर सकते। उधर रोजगार सृजन व आय में वृद्धि होने की संभावना न होने पर उपभोक्ता भी नए ऋण लेने का जोखिम लेने के बजाय अपने उपभोग की मात्रा को कम करते हैं। घर, कार, टीवी, आदि सभी तरह के स्थायी व रोज़मर्रा के उपभोग की सामग्री की बिक्री में कमी की वजह यही है। इस स्थिति से बाहर निकलने का एक ही रास्ता होता है कि कुछ कमजोर पूंजीपति दिवालिया होकर बाजार से बाहर हो जायें ताकि उनके हिस्से का बाजार प्राप्त कर बाकी का कारोबार फिर चल सके।

असल में जैसा हमने ऊपर देखा ब्याज दर कम करना मुनाफे की गिरती दर के संकट का नतीजा है, इसका समाधान नहीं। न ब्याज दर कम करने से पहले कभी अर्थव्यवस्था के संकट का कोई समाधान हुआ है, न अब होगा। इसीलिए भारत में भी ब्याज दरों में लगातार कटौती के बाद भी वृद्धि दर गिरती ही जा रही है। हाँ इसका एक असर होगा कि बहुत से मध्यमवर्गीय लोग, खास तौर पर सेवानिवृत्त लोग, जो बचत पर मिलने वाले बैंक ब्याज को अपने जीवनयापन का आधार मान रहे थे उनके जीवन में संकट बहुत तेजी से बढ़ने वाला है क्योंकि पूंजीपति वर्ग अब इतना अधिशेष उत्पन्न नहीं कर पा रहा है कि उन्हें उसमें से एक हिस्सा दे सके।


4.5% जीडीपी वृद्धि दर भी संदिग्ध है, हालात इससे भी ज़्यादा ख़राब

4.5% जीडीपी वृद्धि दर भी संदिग्ध है, हालात इससे भी ज़्यादा ख़राब

29 नवंबर को राष्ट्रीय सांख्यिकी संगठन (NSO) ने वित्तीय वर्ष 2019-20 की दूसरी तिमाही अर्थात जुलाई-सितंबर के लिए सकल घरेलू उत्पाद अर्थात जीडीपी के आँकड़े जारी किये तो आधिकारिक वृद्धि दर 4.5% घोषित की गई। यह वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर है अर्थात पिछले साल के मूल्यों के आधार पर। जीडीपी गणना पहले वर्तमान मूल्यों पर की जाती है जिसे आंकिक जीडीपी वृद्धि दर कहा जाता है। यह इस बार 6.1% रही है। फिर इसे पिछले वर्ष से अर्थपूर्ण तुलना के लिए इसमें से मुद्रास्फीति की दर घटाकर वास्तविक वृद्धि दर निकाली जाती है, अर्थात 1.6% थोक मूल्य सूचकांक दर को घटाकर 4.5% वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर प्राप्त हुई।
किंतु इसके पहले या साथ जो अन्य आँकड़े सामने आए हैं वे बताते हैं कि यह वृद्धि दर भी विश्वसनीय नहीं है। वर्ष के पहले 7 महीने में ही वित्तीय घाटा पूरे साल के लक्ष्य से भी 2% अधिक हो चुका है जबकि 5 महीने अभी बाकी हैं। कर वसूली लक्ष्य से लगभग 2 लाख करोड़ रुपये पीछे है। बिजली, कोयला, सीमेंट, इस्पात, कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस, तेल शोधन जैसे 8 मूल उद्योगों के उत्पादन में सितंबर में 5.1% कमी के बाद अक्टूबर में भी 5.8% की गिरावट है। सिर्फ रासायनिक खाद ही एक क्षेत्र है जहाँ उत्पादन नहीं गिरा है, संभवतः अगले बुआई मौसम की माँग को दृष्टि में रखते हुये।
बिजली की खपत में भारी गिरावट भी पूरी अर्थव्यवस्था की गति मंद पड़ने की गवाही दे रही है। रेल व वायु दोनों के जरिये माल ढुलाई घटी है, यहाँ तक कि यात्रियों की संख्या भी नहीं बढ़ रही है। निर्माण क्षेत्र में भारी गिरावट है क्योंकि 8 लाख से अधिक निर्मित घर बिना बिके पड़े हैं। कारों सहित सभी वाहनों एवं ट्रैक्टरों की बिक्री पिछले एक वर्ष से लगातार गिर रही है। खुद सरकारी सर्वेक्षण बता रहे हैं कि कम होती आय के कारण आम लोग भोजन – दाल, नमक, चीनी, चाय, जैसी जरूरी चीजों के उपभोग में भी कटौती करने पर मजबूर हो रहे हैं।
दूसरी ओर सेवा क्षेत्र को देखें तो उसके सबसे महत्वपूर्ण अंश वित्तीय क्षेत्र में बैंकों के बाद अब गैर बैंक वित्तीय कंपनियों में संकट फैलता ही जा रहा है और कई बड़ी कंपनियाँ दिवालिया हो चुकी हैं। फिर जहाँ आम लोग जरूरी उपभोग की वस्तुओं की ख़रीदारी में कटौती कर रहे हों वहाँ यह मान लेना तार्किक नहीं होगा कि यात्रा, होटल, पर्यटन, रेस्टोरैंट में भोजन, मनोरंजन, जैसी अन्य महत्वपूर्ण सेवाओं की माँग पुरानी दर पर ही बढ़ रही होगी। बल्कि हाल के दिनों में तो स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र के हवाले से ऐसी भी खबरें आईं हैं कि लोग जीवन का प्रश्न न हो तो अहम स्वास्थ्य संबंधी कार्यों जैसे सर्जरी आदि तक को भी स्थगित कर रहे हैं।
उसकी वजह भी स्पष्ट है– रोजगार सृजन के बजाय रोजगारों का विनाश और परिणामस्वरूप मजदूरी दर में गिरावट और आय में कमी। कई डेटाबेस बता रहे हैं कि बेरोजगारी की दर 8.5% के ऐतिहासिक उच्च स्तर पर है, खास तौर पर नौजवान पीढ़ी अर्थात 15-29 साल के आयु वर्ग में तो यह लगभग 30% पहुँच चुकी है। किन्तु यह आँकड़ा भी आंशिक सच को ही जाहिर करता है क्योंकि बेरोजगारी दर की गणना सिर्फ उनमें से की जाती है जो श्रम बल का अंग हैं अर्थात या तो रोजगाररत हैं या सक्रिय रूप से रोजगार ढूँढ रहे हैं। किन्तु बेरोजगारी की बढ़ती समस्या के कारण जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा विशेषतया स्त्रियाँ एवं शिक्षित युवा श्रम बल से ही बाहर हो गए हैं।
श्रम बल में जनसंख्या के काम करने लायक आयु वर्ग अर्थात 15-60 वर्ष तक में से असल में रोजगाररत या सक्रिय रूप से काम ढूँढने वालों को गिना जाता है। 2015-16 तक काम करने लायक आयु वर्ग में से 47-48% संख्या श्रम बल का हिस्सा थी किन्तु ताजा आँकड़ों के मुताबिक यह 42% ही रह गया है। अनुमानतः हम कह सकते हैं कि रोजगार ढूँढ पाने में असफलता की हताशा से कई करोड़ की तादाद में काम करने लायक नागरिक श्रम बल से ही बाहर हो गए हैं जो अर्थव्यवस्था में अतीव गहरे संकट की ओर इशारा करता है क्योंकि आम तौर पर दुनिया भर में यह आँकड़ा औसतन 55-65% के बीच है जबकि चीन में तो हाल के वर्षों में आई गिरावट के बावजूद भी यह लगभग 75-80% है। यह आँकड़ा ही भारत में बेरोजगारी की असली भयावहता को दर्शाता है। इसी की वजह से जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा किसी भी हालत में जिंदा रहने के लिए निम्न से निम्न मजदूरी पर बिना किसी सुरक्षा के खतरनाक से खतरनाक तक काम करने के लिए तैयार होता है और मजदूरी दर गिर जाती है जिससे गरीबी के चंगुल से निकलना और भी नामुमकिन होता जाता है।
तब सवाल उठता है कि आर्थिक संकट की इस स्थिति में भी जीडीपी वृद्धि दर बहुत गिरने के बाद भी 4.5% कैसे हो सकती है? क्या यह विश्वसनीय है? जीडीपी की गणना विधियों की चर्चा तो अपने आप में एक विस्तृत विषय है जो इस लेख में नहीं किया जा सकता, किन्तु खुद सरकार द्वारा इस वर्ष के बजट अनुमानों और अब तक ज्ञात वास्तविक आँकड़ों के आधार पर हम इस पर कुछ संकेत अवश्य प्राप्त कर सकते हैं।
वित्त मंत्री द्वारा फरवरी में प्रस्तुत बजट प्रस्ताव के अनुसार इस वित्तीय वर्ष में कर वसूली लगभग 19% बढ़ने का अनुमान था। इसका आधार था वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर में 7-8% तथा आंकिक जीडीपी वृद्धि दर में अनुमानित 12% वृद्धि। सरकार का मानना है कि नोटबंदी व जीएसटी के बाद अर्थव्यवस्था में औपचारिकीकरण बढ़ा है तथा काले धन व भ्रष्टाचार पर सख्त कार्रवाई के कारण लोग कर क़ानूनों का पालन भी अधिक कर रहे हैं। अतः कर उछाल दर बढ़ी है। इस आधार पर 12% आंकिक जीडीपी वृद्धि दर पर कर संग्रह में 19% वृद्धि का अनुमान लगाया गया था। लेकिन वास्तविक आँकड़े बता रहे हैं कि अभी तक कर संग्रह मुश्किल से 4-5% ही बढ़ा है।
अगर हम कॉर्पोरेट कर में दी गई छूट से हुई कमी को भी हिसाब में लें तब भी बजट अनुमानों के मुक़ाबले कर संग्रह में मुश्किल से 5-6% ही वृद्धि हुई है। किन्तु अगर 12% आंकिक जीडीपी वृद्धि से कर संग्रह 19% बढ़ने वाला था और कर संग्रह मुश्किल से 5-6% ही बढ़ा है तो राष्ट्रीय सांख्यिकी संगठन द्वारा घोषित दूसरी तिमाही की आंकिक जीडीपी वृद्धि दर अर्थात 6.1% कतई विश्वसनीय नहीं रह जाती, बल्कि यह मुश्किल से ही 4% से भी कुछ कम ही होनी चाहिये। इसमें से अगर हम खुद सांख्यिकी संगठन द्वारा घटाई गई महंगाई दर अर्थात 1.6% को घटा दें तो यह दर लगभग 2% से कुछ ही ऊपर रह जायेगी।
यह गणना भी हमने मात्र सरकारी आँकड़ों और सार्वजनिक जानकारी के आधार पर की है। अगर हम जीडीपी गणना पद्धति पर कई साल से उठ रहे सवालों को भी साथ में जोड़ें तो 2% का यह अनुमान भी अतिशयोक्ति जैसा ही सिद्ध होगा। वास्तविक सामाजिक जीवन में भी आम लोग जिस किस्म की आर्थिक तंगी महसूस कर रहे हैं, वह भी इस अनुमान की ही पुष्टि करता है कि वास्तव में भारतीय अर्थव्यवस्था या कहें सकल राष्ट्रीय आय में अगर कमी भी न कहें तो कोई वृद्धि तो नहीं ही हो रही है। इस आय में भी वितरण का प्रश्न अर्थात इसका कितना हिस्सा किसको मिलता है और किसके हिस्से में कमी या वृद्धि हो रही है, एक अलग प्रश्न है जो इस बात को स्पष्ट करता है आम जनता की आर्थिक स्थिति में संकट की वास्तविक प्रवृत्ति क्या है।

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30/11/2019

Friday, November 8, 2019

शेतकर्याची आसुड (किसान का चाबुक) - जोतीराव फुले



जोतीराव (जोतीबा) फुले 19वीं सदी के भारत के अग्रणी चिंतक थे, जिन्होंने भारतीय समाज को सदियों से जकड़े जातिगत और स्त्री उत्पीड़न के ब्राह्मणवादी विचार के विरुद्ध संघर्ष को आधुनिक समता बंधुत्व स्वतंत्रता की जनवादी दृष्टि से वैचारिक-सैद्धांतिक आधार प्रदान किया; सबसे पहले सभी के लिए मुफ्त सार्वजनिक शिक्षा का सवाल उठाया, औपनिवेशिक व्यवस्था में किसान-दस्तकार समुदायों के निर्मम शोषण का प्रथम विस्तृत विवरण भी लिखा एवं श्रमिकों को संगठित करने के प्रथम प्रयास किये। पर अभी भी ज्यादा लोग फुले के लेखन से परिचित नहीं हैं। 1873 में लिखित 'गुलामगिरी' को तो कुछ हद तक जाना-पढ़ा भी गया है, पर 1883 में लिखित उनकी अत्यंत महत्वपूर्ण 'किसान का चाबुक' को बहुत कम जाना जाता है। इस पुस्तक का संक्षिप्त परिचय और आलोचना यहाँ प्रस्तुत है।

परिप्रेक्ष्य के लिए यह जानना जरुरी है कि अपनी युवावस्था के आरम्भ में ही फुले यूरोप-अमेरिका के 18वीं सदी की बुर्जुआ जनतांत्रिक क्रांतियों के अग्रणी मानवतावादी चिंतकों के विचारों से परिचित हो चुके थे। इनमें भी मानव समानता और मुक्ति के सबसे क्रांतिकारी चिंतक थॉमस पेन की 'राइट्स ऑफ़ मैन' फुले 1847 में पढ़ चुके थे और समता, बंधुत्व, मानव स्वतंत्रता के रेडिकल विचार उनके प्रेरणा स्रोत बन चुके थे। यूरोपीय विचारकों के इन विचारों से प्रभावित फुले भारत में यूरोपीय शासन की एक प्रगतिशील भूमिका मानते थे। पर इसके ठीक विपरीत ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन तंत्र द्वारा भारतीय समाज में ब्राह्मणवादी प्रभुत्व को मान्यता-संरक्षण और शासन चलाने के लिए उसके साथ किये गठजोड़ का यथार्थ अनुभव उनके दिमाग में बहुत सारे प्रश्न भी खड़े कर रहा था। औपनिवेशिक शासन की शोषणकारी नीतियों द्वारा शूद्र-अतिशूद्र किसान, दस्तकार और मजदूर समुदायों के जीवन में आई भारी तबाही-विपत्ति भी उनके सामने थी और इसके कारणों और उपायों पर भी वह चिंतित थे। शिवाजी के नेतृत्व में जो शूद्र कुनबी राजा जागीरदार बन कर खुद को मराठा कहने लगे थे (भोंसले, सिंधिया, होल्कर, गायकवाड़, आदि) खुद उनके दरबार-प्रशासनिक तंत्र में भी कैसे ब्राह्मणवादी प्रभुत्व हो गया था और उसके द्वारा शूद्रों-अतिशूद्रों के निर्मम शोषण के तथ्य का जिक्र भी फुले इस पुस्तक के प्राक्कथन में ही करते हैं। 

पुस्तक के पहले अध्याय में फुले बताते हैं कि एक ओर तो अशिक्षित किसान ब्राह्मणवादी पुरातनपंथी धार्मिक विचारों की जकड़न के शिकार है, साथ ही औपनिवेशिक शासन का सारा तंत्र भी भट-ब्राह्मण कर्मचारियों पर ही टिका है। अपनी तीक्ष्ण व्यंग्यात्मक शैली में फुले विस्तार से इसका वर्णन करते हैं कि कैसे पूरे जीवन ही नहीं बल्कि उसके पहले मां द्वारा गर्भधारण के वक़्त से ही चालाक ब्राह्मण कर्मकांडों के द्वारा किसान परिवारों की लूट शुरू होती है और एक किसान की मृत्यु के बाद उसके बच्चों द्वारा श्राद्ध के रूप में जारी रहती है। जन्म, मृत्यु, विवाह हो या किसी का मकान बनना हो अर्थात जीवन के हर कार्य में ब्राह्मण कर्मकांड अनिवार्य अंग हैं और हरेक में दक्षिणा के नाम पर पंडे-पुजारियों की असीम लालसा-हवस प्रकट होती है और वे किसानों के खून-पसीने की मेहनत की उपज का एक बड़ा हिस्सा लूटने में सफल होते हैं। इसके आगे फुले चैत्र प्रथमा से फाल्गुन अंत की होली पूजा तक की तमाम अमावस्या-पूर्णिमा, एकादशी, चतुर्दशी, अष्टमी-नवमी, ग्रहण, मेलों-त्यौहारों, देवी पूजा, सत्यनारायण, रामायण, महाभारत, आदि की कथाओं के नाम पर ब्राह्मणी कर्मकांडों में पंडों द्वारा किसानों को फंसा कर की गई वर्ष भर की लूट का भी पूरा ब्यौरा देते हैं।
यही ब्राह्मण इन शूद्र किसानों के बच्चों को अपने संस्कृत विद्यालय में प्रवेश नहीं देते। हाँ, अहसान के तौर पर कुछ को प्राकृत मराठी विद्यालय में ले लेते हैं। इसके बदले मासिक शुल्क ही नहीं, अमावस्या-पूर्णिमा और तमाम तिथियों पर उनसे भेंट में सीधा (अन्न आदि सूखा, कच्चा भोज्य पदार्थ) भी वसूल करते हैं। और इसके बदले में जमीन पर कुछ अक्षर, मोदी (मराठी की एक पुरानी लिपि), थोड़ा कच्चा हिसाब, कुछ बेकार गाथाएं और लावणी जैसे गाने सिखाते हैं जिससे वे तमाशे में अभिनय करने लायक बन जाएं। पर इससे वे इस लायक भी नहीं हो पाते कि अपने घर का हिसाब-किताब ही पूरी तरह रख पाएं, किसी दफ्तर में क्लर्क, मामलातदार, वग़ैरह बनना तो बड़ी दूर की बात है।

इतने लम्बे वक्त से इस ब्राह्मणवादी शोषण-ठगी को चलते जाने का मुख्य कारण फुले के अनुसार ब्राह्मणों द्वारा अपने शासन व्यवस्था में पहुंचने के समय से ही शूद्रों को शिक्षा से वंचित रखने के अन्यायपूर्ण नियम-कायदे हैं। दूसरा कारण है कि राजसत्ता में जो भी रहा, चाहे शिवाजी जैसे शूद्र राजा ही क्यों न हो, उनके शासन तंत्र में ब्राह्मणों ने प्रभुत्व कायम कर लिया। इसके लिए वे शिवाजी की अशिक्षा और ब्राह्मणों की चालाकी को जिम्मेदार मानते हैं। शिवाजी के वंशजों के वक्त ब्राह्मण पेशवाओं द्वारा शासन अपने हाथ में लेकर किये गए अन्याय-अत्याचार का भी विस्तृत ब्यौरा यहां दिया गया है।

आगे फुले कहते हैं कि कायर ब्रिटिश हुकूमत भी इन्हीं ब्राह्मणवादी परम्पराओं, कायदों को न सिर्फ चलने दे रही है बल्कि इन पर हजारों रुपये भी खर्च करती है जो किसानों के खून-पसीने की कमाई से टैक्स के रूप में वसूल किये जाते हैं। उनकी शिकायत है कि ब्राह्मण सरकारी अमला किसानों की सही दयनीय हालत को ब्रिटिश हुक्काम तक नहीं पहुंचता, नहीं तो दयालु अंग्रेज हुकूमत जरूर उनकी दशा सुधारने के लिए कुछ कदम उठाती। निष्कर्ष में फुले कहते हैं कि ब्राह्मणवादी शोषण से धन और वक्त दोनों में अज्ञानी किसान की हालत इतनी बदतर हो चुकी है, पीढ़ियों से शिक्षा का इतना डर उसके दिमाग में बिठाया जा चुका है कि उसमें अपने बच्चों को शिक्षित करने की कूव्वत और हिम्मत बची ही नहीं है। यहाँ यह कह देना उपयुक्त होगा कि फुले जब किसान कह रहे हैं तो सिर्फ खेती करने वाले ही नहीं बल्कि पशुपालक, बागबान और कृषि से सम्बंधित अन्य काम करने वाले भी इसमें शामिल हैं। 

दूसरे अध्याय में फुले ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता की नीतियों और देशी रजवाड़ों-जमींदारों तथा ब्राह्मणवादी तंत्र के साथ उसके गठजोड़ के परिणामस्वरूप शूद्र-अतिशूद्र किसानों, पशु पालकों, दस्तकारों के भयंकर शोषण और उससे उत्पन्न अकाल-भुखमरी की स्थिति की चर्चा करते हैं। इसके तहत वे मुख्यतः इन बिंदुओं की चर्चा करते हैं –
1. अंग्रेजी हुकूमत द्वारा किये गए जमीन बंदोबस्त में खेत का लगान उपज से जुड़ा नहीं बल्कि जमीन के रकबे से निश्चित होने और हर 30 साल में इसके बढ़ाये जाने की व्यवस्था
2. वन विभाग द्वारा गरीब किसानों और भूमिहीनों को लकड़ी, फल, पत्ते, आदि वन उत्पादों तथा गाय-बकरी पालक दूध बेचने वालों को चरागाह से वंचित करना
3. परिणामस्वरूप उत्पन्न खेती के संकट से बहुत से गरीब किसानों का परिवारों सहित मजदूरी के लिए मजबूर होना
4. ब्रिटिश कारखानों के सस्ते मशीनी उत्पादों के सामने दस्तकारों के उत्पादों के ना टिक पाने से बुनकरों, जुलाहों, आदि की बरबादी
5. साहूकारों द्वारा जमीन लिखवाकर सूद पर कर्ज देना और किसानों की जमीनें कब्ज़ा लेना
5. पहले के राजाओं-बादशाहों द्वारा शूद्र-अति शूद्रों को जो रोजगार मिलते भी थे, उनको भी अंग्रेजी राज में बंद कर सिर्फ ब्राह्मणों को सरकारी अमले में भर्ती करना
6. अंग्रेजी हुक्काम का भ्रष्टाचार, ऐशो-आराम और अपने मातहत ब्राह्मण अमले के जरिये सरकारी दफ्तरों, पुलिस, अदालत, आदि में किसानों का भारी शोषण-दहन
फुले बताते हैं कि इन सबके परिणामस्वरूप शूद्रों-अति शूद्रों के जीवन की वास्तविक स्थिति में अत्यंत गिरावट आई और वे भारी पैमाने पर अकाल और भुखमरी का शिकार होने लगे। अपने परिवारों-बच्चों की इस दर्दनाक हालत में कुछ न कर पाने में असमर्थ कुछ किसान-दस्तकार हताशा में नशे और अपराधी वृत्तियों का शिकार होने का ज़िक्र भी उन्होंने किया है।

फुले खास तौर पर शिक्षा व्यवस्था की बदहाली और किसानों को उससे वंचित रखने की आलोचना करते हैं। उनके अनुसार सरकार शिक्षा प्रसार के नाम पर किसानों से लाखों रुपये लोकल फंड इकट्ठा करती है पर उसमें से मुश्किल से एक तिहाई ही दिखावे के लिए खर्च कर यहां-वहां कुछ स्कूल बनाती है जिसमें कुछ पंडे शिक्षकों को रख देती है जो पढ़ाने के बजाय दिन भर अपने कर्मकांड में ही लगे रहते हैं। अंग्रेजी सरकार ने बहुत आलोचना के बाद शिक्षा के लिए जो हंटर आयोग बनाया था उस पर सख्त कटाक्ष करते हुए फुले कहते हैं कि उसने आम जनता के लिए शिक्षा की वास्तविक हालत जानने का प्रयास करने के बजाय बम्बई, मद्रास में सिर्फ ब्राह्मण, पारसी, ईसाई अभिजात लोगों की बात सुनी और वापस कलकत्ता की ओर कदम बढ़ा दिए। (अंग्रेजी हुकूमत द्वारा आम जनता के लिए सार्वजनिक शिक्षा की व्यवस्था के बजाय सिर्फ ब्राह्मणों-अभिजातों के लिए उच्च शिक्षा पर ध्यान देने के मुद्दे पर फुले ने इस हंटर आयोग को एक प्रतिवेदन भी लिखा था, जिसे अलग से पढ़ा जा सकता है।)

फुले की बात के परिप्रेक्ष्य को समझने के लिए यहां कुछ ऐतिहासिक तथ्य प्रस्तुत करना जरुरी है। ब्रिटिश पूर्व काल में भारत में आम तौर पर कृषि भूमि ग्राम समाजों के सामूहिक प्रबंधन में होती थी और कृषि लगान की व्यवस्था मूलतः उपज के हिस्से पर आधारित थी। इसलिए पहले के राजा-बादशाह सामंती शोषक होते हुए भी खुद अपने हित में उपज को सुनिश्चित करने के लिए तालाब-कुंए आदि बनवाने में दिलचस्पी रखते थे। अकाल से बचने के लिए नई फसल को कुठारों में रख पिछली फसल को भोजन हेतु प्रयोग करने की परंपरा थी। इन ग्राम समाजों में भी शोषण-उत्पीड़न था पर दो साल से ज्यादा सूखा या प्राकृतिक आपदा होने से ही अकाल की स्थिति आती थी। लेकिन कॉर्नवालिस द्वारा 1793 में किये गए स्थाई जमींदारी बंदोबस्त या महालवाड़ी/रैयतवाड़ी व्यवस्थाओं में लगान को जमीन के रकबे की माप के आधार पर रुपये में तय कर दिया - उपज हो या नहीं; यह लगान हर 30 वर्ष में बढ़ाया भी जाता था। फिर जमींदार और उसके कर्मचारियों द्वारा अंग्रेजी सरकार को इतना लगान देने के बाद भी और वसूली/बेगार लिया जाता था। साथ में रेलवे आने के बाद फसल आने पर सस्ते दामों पर व्यापारियों द्वारा इसकी खरीदारी मालगाड़ियों से बंदरगाह होते हुए इसके निर्यात का बाजार भी शुरू हुआ। लेकिन फसल के बाद में जरुरत के वक्त अनाज के दाम बढ़ जाते थे। इसलिए अब अनाज भंडारण का बफर भी नहीं रहा और एक मौसम में बारिश न होने या कई बार तो अच्छी फसल के साल में भी अकाल पड़ने लगे क्योंकि लगान, कर्ज, सूद चुकाने की गरज में फसल के वक्त सस्ता बेचना और फिर महंगे दाम खरीदना ग्रामीण जनता की विवशता बन गया। 19 वीं सदी में अंग्रेजी सरकार के रिकॉर्ड मुताबिक 31 अकाल में 3 करोड़ 25 लाख लोग मरे, फुले के लिखते वक्त 1875-1900 में ही 2 करोड़ 60 लाख लोग अकाल मृत्यु के शिकार हुए। वैसे असली संख्या कहीं ज्यादा थी - ब्रिटिश मेडिकल जर्नल लैंसेट के अनुसार 1890-1900 के दशक में ही 1 करोड़ 90 लाख लोग मरे। अच्छी फसल के साल 1943 में चर्चिल द्वारा फसल जब्त करा लिए जाने से बंगाल में 50 लाख लोग भूख से मरे। 

यह निरंतर गंभीर होती दर्दनाक स्थिति फुले के सामने थी और यह समझना मुश्किल नहीं होना चाहिए कि इसका मुख्य भुक्तभोगी समाज का ऊपरी ब्राह्मण-सवर्ण तबका नहीं बल्कि किसान, भूमिहीन मजदूर और दस्तकार शूद्र-अतिशूद्र जनता थी। इसीलिए यहां फुले ब्राह्मणों के साथ-साथ न सिर्फ ब्रिटिश शासकों बल्कि नए उभर रहे समाज सुधारकों पर भी व्यंग्य-कटाक्ष करते नजर आते हैं क्योंकि उनकी नजर में सर्वाधिक शोषित-पीड़ित जनता पर अन्याय के प्रतिकार के बगैर किसी राष्ट्रीय या सामाजिक सुधार का कोई अर्थ नहीं। 1947 तक के पूरे राष्ट्रीय आंदोलन पर उनकी यह शुरुआती टिप्पणी अहम है; अपने कुछ अन्य लेखों में उन्होंने इस पर और अधिक लिखा है।

तीसरे अध्याय में ज्योतिबा फुले अंग्रेजी औपनिवेशिक व्यवस्था द्वारा वंशागत अभिजात्य की ब्राह्मणवादी व्यवस्था को अपना एजेंट-सहयोगी बना लेने और दोनों के इस गठजोड़ द्वारा शूद्र-अतिशूद्र किसान-दस्तकार-मजदूर जनता के भयानक शोषण-दहन की आर्थिक व्यवस्था का विस्तार से विश्लेषण-वर्णन करते हुए इस अत्याचार के न रुकने पर ब्रिटिश उपनिवेशवादियों को किसानों के विद्रोह के संकेत के रूप में इसके भयानक नतीजे होने की चेतावनी भी देते हैं। 

फुले पहले प्राचीन भारत में मूल निवासी गणतंत्रों-राज्यों, उन पर आर्यों-यवनों के आक्रमण और वर्ण-जाति की उत्पत्ति पर अपने विचार रखते हैं। फिर मनुस्मृति आदि में ब्राह्मणों द्वारा बनाये गए अत्याचारी कायदों और शूद्र-अति शूद्रों को शिक्षा से वंचित करने तथा इसके प्रभाव से पैदा अज्ञान में ब्राह्मणों द्वारा उन पर किये गए नियंत्रण की चर्चा करते हैं। इसके बाद फुले कहते हैं कि अंग्रेज हुकूमत ने बहुत जल्दी ब्राह्मणों के इस नियंत्रण को समझकर उन्हें अपने शोषण में सहयोगी बना लिया जिससे उन्हें अपनी लूट में कम से कम प्रतिरोध का सामना करना पड़े और शीर्ष पर बैठे अंग्रेज ऐशो आराम का जीवन बिता सकें। इसके लिए उन्होंने ब्राह्मणों को अपने शासन में कर्मचारी रखा, उन्हें संरक्षण दिया। खुद और अपने ब्राह्मण कर्मचारियों की बड़ी कमाई के लिए उन्होंने अपने द्वारा स्थापित जमींदारी व्यवस्था में किसानों पर लगान के रूप में भारी टैक्स लगाए, जिन्हें हर 30 साल में बढ़ाने की भी व्यवस्था की। किसानों के बच्चों को शिक्षित करने के बहाने 'लोकल फंड' वसूलना शुरू किया, सड़क पर हर 6 मील पर एक्साइज (चुंगी) चौकी बना दी जो अपनी उपज बेचने जाते किसानों से लाखों रुपये इकठ्ठा करने लगी; शहर की मंडी में अनाज-सब्जी बेचने जाने पर म्युनिसिपल टैक्स लगा दिया और नमक तक पर कर लगा दिया। जो किसान जंगल से लकड़ी, फल, पत्ते, आदि एकत्र कर बेचते थे उन्हें वन विभाग ने जीविका से वंचित कर दिया। ऊपर से किसानों की उपज को मनमाने सस्ते दामों पर खरीद कर इंग्लैंड के मजदूरों को बेचने के लिए ख़रीदा जाने लगा जिससे इन व्यापारियों ने भारी कमाई की। पिछले अध्याय में अकालों की स्थिति के एक कारण के रूप में हम इसकी चर्चा पहले ही कर चुके हैं।

इसके आगे फुले कहते हैं कि भारत की पुरानी सामंती व्यवस्था में सभी किस्म के राजा बांध, नहर, कुएं, तालाब, सड़क, सराय, स्नानघर, पेड़-जंगल, आदि उपज के हिस्से के तौर पर वसूल किये सार्वजनिक कोष से करते थे, इनके लिए अलग से टैक्स नहीं लेते थे। अंग्रेजों ने सिंचाई, सड़क की व्यवस्था के लिए अलग से किसानों से वसूली शुरू की; साथ ही इन पर खर्च के नाम पर ब्रिटिश बैंकों से भारी कर्ज लेकर उसे भारतीय जनता पर लाद दिया गया, जिसके ब्याज के तौर पर सालाना सैंकड़ों करोड़ रूपया भारत के किसानों से टैक्स के रूप में वसूल होकर इंग्लैंड के बैंकों को जाने लगा। इस स्थिति में अधिकांश किसानों को फसल की लागत भी वसूल नहीं होती और वे लगान चुकाने के लिए भी सूदखोरों से कर्ज लेने को विवश होते हैं। ऊपर से सरकार कहती है कि किसान को कोई दिक्कत नहीं, उनकी गरीबी का कारण शादी-ब्याह में शान-शौक़त पर किया गया खर्च है। 

फिर ब्रिटिश उद्योगों का सस्ता माल भारत आने लगा, उस पर आयात शुल्क भी शून्य कर दिया गया, जिससे वह देशी दस्तकारों के उत्पादों से सस्ता बिकने लगा। इससे लुहार, जुलाहे, बुनकर, चमड़े का काम करने वाले, जूते बनाने वाले, आदि सभी किस्म के भारतीय दस्तकार पूरी तरह बरबाद होकर भुखमरी का शिकार होने लगे। इसके आगे फुले बहुत विस्तार से ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट का वर्णन करते हुए 4-5 बेटों और उनकी बहुओं के पूरे परिवार सहित 8 बैलों की खेती करने वाले किसान और सबसे निचले दर्जे के अंग्रेज - फ़ौज के गोरे सिपाही - के बीच तुलना करते हैं। वे दिन रात की हाड़तोड़ मेहनत के बाद किसान के घर, भोजन, वस्त्रों, आदि की दुर्दशा, शिक्षा-चिकित्सा के अभाव के साथ गोरे फौजी के वेतन, निवास, पलंग-बिस्तर, कपड़ों, भोजन, शराब, जूतों, इलाज-दवा, ऐश-आराम के जीवन की धुर विपरीत तस्वीर खींचते हुए अंग्रेजी औपनिवेशिक व्यवस्था की लूट और उसके स्वार्थी-भ्रष्ट ब्राह्मण कर्मचारियों की इस पूरे लूट के निजाम को चलाने में भूमिका को भी दिखाते हैं। वह कहते हैं कि यह व्यवस्था आम लोगों को बेईमानी और अनैतिक रास्ते अपनाने का प्रशिक्षण दे रही है।

निष्कर्ष में फुले ब्रिटिश सरकार को चेतावनी देते हैं कि यह लूट अगर कम नहीं हुई, हुकूमत के सरंजाम पर भारी खर्च के लिए अगर किसान-दस्तकार-मजदूर जनता को इसी तरह लूटा जाता रहा तो इसके भयंकर परिणाम के लिए तैयार रहे। एक प्रकार से फुले 1857 जैसे विद्रोह का इशारा करते हैं। हालांकि यह भी जान लेना जरुरी है कि पुराने सामंतों के नेतृत्व में हुए 1857 के विद्रोह के फुले विरोधी थे।   
    
पुस्तक के चौथे अध्याय में फुले एक परिवार का उदाहरण लेकर किसानों के जीवन में छाई भारी विपत्ति का मार्मिक चित्रण करते हैं जिसको यहाँ संक्षेप में लिखना मुमकिन नहीं। उनके अनुसार अंग्रेजी औपनिवेशिक शासन के पहले किसानों का जीवन तुलनात्मक रूप से बेहतर था, वे अकाल-भुखमरी का शिकार नहीं थे। लेकिन औपनिवेशिक शासन द्वारा किये जमीन बंदोबस्त में लगाए गए भारी टैक्स और अन्य किस्म की उगाही-वसूली, हर 30 साल में इनमें वृद्धि, अंग्रेज अफसरों और उनके मातहत ब्राह्मण कर्मचारियों की अय्याशी-लूट, पाटिल-कुलकर्णी आदि पारम्परिक पदाधिकारियों द्वारा औपनिवेशिक शोषण तंत्र में शामिल हो जाना, औपनिवेशिक शासन की नीतियों से कृषि के लिए जरुरी पशुधन का नष्ट होना, हर वर्ष अनाज, कपास, चमड़े, ऊन, आदि जिंसों का विदेशों में बड़े पैमाने पर निर्यात, विदेश में उत्पादित मालों का आयात, अंग्रेज शासन के गोरे अफसरों, इंजीनियरों, डॉक्टरों द्वारा ब्रिटिश सरमायेदारों के फायदे के लिए काम करना, इसके चलते किसान का सूदखोरों के जाल में फंसना, अपनी संपत्ति को गंवाते जाना, अशिक्षा-अन्धविश्वास के शिकार किसानों का ब्राह्मण कर्मकांडों द्वारा निर्मम शोषण। इन सबका नतीजा है बड़े पैमाने पर किसानों का अकाल, भुखमरी और महामारियों का शिकार होकर जान गंवाना। फुले बताते हैं कि इस विपत्ति भरे जीवन की हताशा-निराशा का नतीजा ही बड़ी संख्या में किसान परिवारों के नौजवानों का नशा, वेश्यावृत्ति, आपराधिक जीवन, जैसी बुराइयों में फंसकर अपने जीवन को बरबाद करने में भी हो रहा है। अंग्रेज सरकार द्वारा किसानों की शिक्षा के नाम पर लोकल फंड में लाखों रुपये की उगाही कर शिक्षा का कोई इंतजाम न करने की बात करते हुए फुले व्यंग्य से कहते हैं कि अगर किसान शिक्षित हो जाये तो वह चाबुक का शिकार होने के बजाय चाबुक चलाने लगेगा और उसके डर से ये सारे अंग्रेज अफसर-कर्मचारी चीखते-चिल्लाते सीधे अमेरिका जाकर रुकेंगे, जहाँ उन्हें दिन रात मेहनत कर अपना पेट भरना पड़ेगा।

एक और बहुत महत्वपूर्ण पक्ष जिसकी और फुले यहाँ संकेत करते हैं वह है उस वक्त राष्ट्रवादी आंदोलन की एकदम शुरुआती अवस्था में उस समय बन रही एसोसिएशनों-सभाओं के चरित्र का विश्लेषण। उनकी नजर में यह सब ब्राह्मणों का आंदोलन था। उनके अनुसार अंग्रेजी शिक्षा-दीक्षा, विदेश यात्रा, आदि से प्राप्त आधुनिकता का लाभ भी मात्र ब्राह्मणों को ही मिला था। इन सभाओं में आम किसानों-दस्तकारों के आर्थिक एवं सामाजिक शोषण का सवाल कहीं नहीं था, उनकी शिक्षा का सवाल इसमें शामिल नहीं था। बल्कि यह लोग तत्कालीन आर्थिक-प्रशासनिक व्यवस्था के बजाय किसानों के द्वारा विवाह, आदि में भारी व्यर्थ खर्च, आदि को उनकी गरीबी, बदहाली का कारण मानते थे।

अंतिम अध्याय में फुले सबसे पहले उस समय संपन्न शिक्षित तबके में आकार ले रहे राष्ट्रीय आंदोलन और उसके द्वारा राष्ट्रीय एकता के आह्वान पर तीखे सवाल उठाते हैं क्योंकि समाज का यह ब्राह्मणवादी सवर्ण तबका ऐतिहासिक रूप से शूद्र-अतिशूद्रों पर अत्याचारों के लिए जिम्मेदार था। उस समय भी यह वर्ग औपनिवेशिक सत्ता के साथ मिलकर किसान, दस्तकार, मजदूर वर्गों के शोषण में हिस्सेदार था। साथ ही यह उन्हें मनुष्य तक मानने को तैयार नहीं था। उनके मत से यह तबका कारोबारी, प्रशासनिक जरूरतों के लिए आधुनिक चिंतन का दिखावा करता था लेकिन अपने सांस्कृतिक, सामाजिक, व्यक्तिगत जीवन में पूरी तरह कट्टर पुरातनपंथी ब्राह्मणवादी रूढ़ियों-विचारों पर कायम था। इसलिए फुले इनसे सीधा सवाल करते हैं कि इनके साथ शूद्र-अतिशूद्र किसान, दस्तकार, मजदूर जनता की एकता किस आधार पर मुमकिन है? भोंसले, होल्कर, सिंधिया, गायकवाड़ जैसे शूद्र राजा भी फुले की दृष्टि से किसान शूद्र-अतिशूद्रों का शोषण करते हुए ऐशो आराम में मस्त थे और उनके शासन-दरबार में भी ब्राह्मणवादी तबका ही हावी था।

अंग्रेजी औपनिवेशिक शासन के बारे में भी फुले का विचार था कि अपने घनघोर शोषण आधारित शासन को चलाने के लिए उन्होंने भी ब्राह्मणवादी तबके को  मददगार मानकर उसे अपना मातहत सहयोगी मान लिया है। औपनिवेशिक शासन में उच्च पदासीन अंग्रेजों के मातहत सभी पदों पर यही तबका जड़ जमाकर भारतीय मेहनतकश जनता की निर्मम लूट का औजार और छोटा हिस्सेदार बन बैठा है। इसीलिए अंग्रेज हुकूमत कृषि के उत्थान और किसानों के कल्याण तथा शिक्षा के लिए कोई कदम नहीं उठाती। यहाँ तक कि इनकी शिक्षा के लिए वसूल किये जाने वाले लाखों रुपये फंड को भी उस मद में खर्च नहीं करती। फुले इस पर गुस्सा जताते हुए अंग्रेजी शासन के लिए इसके खतरनाक नतीजों की चेतावनी देते हैं।

साथ ही फुले मानते हैं कि कुछ सहृदय अंग्रेजों तथा मिशनरियों के कारण उनके जैसे कुछ शूद्रों को भी शिक्षा पाने का अवसर प्राप्त हुआ है जिससे उन्हें ब्राह्मणों ने लम्बे वक्त तक वंचित रखा था। कुछ शूद्रों-अतिशूद्रों को रेलवे, फ़ौज, आदि में नौकरियों का मौका भी मिला था। इससे उनमें जागृति और अपने अधिकारों की चेतना पैदा हुई थी। फुले थॉमस पेन, बेंजामिन फ्रैंकलिन, आदि यूरोपीय जनतांत्रिक-मानवतावादी चिंतकों से भी प्रभावित थे। उनकी नजर में अंग्रेज प्रबुद्ध और आधुनिक विचारों वाले थे। इसलिए औपनिवेशिक शासन के अत्याचारों और उसमें ब्राह्मणों के प्रभुत्व के बावजूद भी उन्हें यह उम्मीद थी कि शोषित-वंचित तबकों के जीवन की वास्तविक स्थिति सामने लाने और उनके जीवन में सुधार की तार्किक मानवीय अपीलों से अंग्रेज शासकों का नजरिया बदला जा सकता है। इसलिए वे औपनिवेशिक सरकार को किसानों के हित के लिए सामान्य और कृषि तकनीकी शिक्षा, सिंचाई व्यवस्था, जमीन को उपजाऊ बनाने और उत्पादकता बढ़ाने से लेकर बहुविवाह, नशे, अश्लील गाने-तमाशों पर रोक, आदि बहुत से कार्यों का सुझाव भी देते हैं।

इस प्रकार 'शेतकर्याची आसुड' में शूद्र-अतिशूद्र किसानों, दस्तकारों, मजदूरों के शोषण पर फुले के विचारों का सार-संक्षेप करें तो पाते हैं कि वे इस शोषण को कुछ चालाक ब्राह्मणों द्वारा मिथकों, कर्मकांडों, देवी-देवताओं के अभिशाप-वरदान के ढोंग-पाखंड की वर्ण-जाति व्यवस्था द्वारा भोले-भाले शूद्रों को ठग लेना मात्र तक सीमित  नहीं समझते। बल्कि इसे समाज में स्थापित राजसत्ता द्वारा संचालित आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था के अंग के रूप में देखते थे। यद्यपि वे इन शब्दों का प्रयोग नहीं करते पर फुले वर्ण-जाति व्यवस्था को समाज के उत्पादन संबंधों और उससे जुड़े शासक-शासित के संबंधों के रूप में समझ रहे थे क्योंकि उत्पादन संबंधों के बिना सत्ता या शासक का कोई अर्थ नहीं। सत्ता के लिए सत्ता जैसी तो कोई चीज होती नहीं, सत्ता का आधार ही समाज के अधिकांश हिस्से द्वारा किये गए श्रम के  उत्पाद को हस्तगत करना है, यह चाहे गुलामी की जंजीर में बंधे दासों से श्रम कराकर हो, या सामंती समाज में किसानों की उपज का बड़ा हिस्सा सामंतों द्वारा हथिया कर किया जाये, या फिर पूंजीवादी समाज में श्रमिकों की श्रम शक्ति द्वारा उत्पादित अधिशेष मूल्य पर पूंजीपति के मालिकाने के द्वारा हो। 

लेकिन अधिकांश मेहनतकश जनता के श्रम की यह लूट सिर्फ सत्ता की फौजी या दंडात्मक ताकत के सहारे ही चला पाना बहुत मुश्किल होता। इसलिए शासक वर्ग ऐसे विचार-दर्शन को भी लेकर आये जो शासितों के दिमाग में इस लूट को उचित मान कर स्वीकार कर लेने का आधार बने तथा इस निर्मम लूट-उत्पीड़न की असहनीय पीड़ा में अफीम जैसा दर्द निवारक बन जाये। जैसा मार्क्स ने कहा हर समाज में प्रचलित प्रभावी विचार शासकों के ही विचार होते हैं। जब पशुपालन और कृषि से निजी संपत्ति अस्तित्व में आई जिस पर पहले पराजित बंदियों, फिर खुद अपने समुदाय के भी गरीब सदस्यों से श्रम कराकर मुखिया, सेनापति अपनी संपत्ति बढ़ा सकें और उसे आगे अपनी संतान को विरासत में दे सकें, तब से ही हर समाज में न सिर्फ एक शोषित वर्ग अस्तित्व में आया बल्कि पितृसत्ता द्वारा स्त्रियों का पराभव भी हुआ। साथ ही इस शोषक व्यवस्था को तार्किक, उचित ठहराने के लिए शासकों ने धर्म, अध्यात्म, दर्शन को भी जन्म दिया।

भारतीय उपमहाद्वीप के भूभाग में शोषण की व्यवस्था को उचित ठहराता शासकों का यह विचार-दर्शन ही ब्राह्मणवाद था क्योंकि इसके कर्मफल, पुनर्जन्म, मोक्ष, श्रेय-प्रेय और वर्णाश्रम के विचार शासितों को अपने जीवन के अन्याय और पीड़ा को सहन और स्वीकार करने में मदद करते थे। इसलिए उसके बाद जो भी शासक रहे उन्होंने ब्राह्मणवाद को अपना संरक्षण दिया। ब्राह्मणों के लिए भी प्रत्येक शासक के साथ गठजोड़ ही अभिप्रेय रहा। इसी लिए शक, यवन, हूण, मंगोल, गुर्जर, आदि जो भी अपनी सैन्य  शक्ति से राजा बना उसे ही ब्राह्मणों ने क्षत्रिय स्वीकार कर लिया। अगर शूद्रों में भी कोई राजा बन बैठा (पाल वंश, नन्द वंश, पूर्व-दक्षिण के अन्य राजवंश, मराठा, आदि) तो ब्राह्मणों को उसके दरबारी-सहयोगी बनने में भी कोई तकलीफ नहीं हुई और शुरुआती टकरावों के बाद उन शासकों को भी ब्राह्मणों को अपने सहयोगी बना लेने में कोई ऐतराज नहीं हुआ क्योंकि वे इस बात को समझ गए कि ब्राह्मणवाद श्रम की लूट और शासितों द्वारा विद्रोह को रोकने में उनके लिए मददगार था। इस्लाम जैसे संगठित धर्म के साथ यह आरम्भिक टकराव ज्यादा हुआ लेकिन मुस्लिम शासकों ने भी अपने शासन के स्थायित्व के लिए बाद में ब्राह्मणवादी अभिजात तबके के साथ अहस्तक्षेप और सहजीवन को स्वीकार कर लिया और मुग़ल दरबारों में फिर से ब्राह्मणवादी अभिजात तबके को इज्जत का स्थान प्राप्त होने लगा।       

फुले भी इसी बात की पुष्टि करते हैं जब वे कहते कि शूद्र राजाओं के दरबार-प्रशासन में भी ब्राह्मण ही छाए हैं और वहां भी शूद्र-अतिशूद्र किसानों का उतना ही शोषण होता है। इसी तरह अंग्रेजों ने भी जल्दी ही समझ लिया कि भारत की जनता पर राज्य करने के लिए ब्राह्मणवादी अभिजात तंत्र बहुत सहायक सिद्ध होगा। इसलिए 1857 से पहले कंपनी शासन के दौरान भारत के पुराने अभिजात वर्ग से जो थोड़ा बहुत टकराव हुआ भी, 1858 में विक्टोरिया की घोषणा द्वारा ब्रिटिश शासन ने इस अभिजात तबके को संरक्षण और उसके हितों में हस्तक्षेप न करने का आश्वासन दे दिया गया और उन्होंने औपनिवेशिक प्रशासन में अधिकांश पदों पर उन्हीं को भर्ती करना शुरू किया। बदले में इस तबके ने भी खुद को ब्रिटिश शासन का ख़ैरख़्वाह घोषित किया जिसकी सबसे बड़ी वैचारिक अभिव्यक्ति औपनिवेशिक कर्मचारी बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के 'आनंदमठ' में हुई जिसमें ब्रिटिश शासन को ब्राह्मणवाद के पूर्ण समर्थन का ऐलान किया गया। इसी विचार पर चलते हुए हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठन अंत तो औपनिवेशिक शासन के वफादार बने रहे। यही वजह है कि औपनिवेशिक हुकूमत शिक्षा के नाम पर बडी रकम टैक्स में वसूल करती थी लेकिन उसका इस्तेमाल भी किसानों की शिक्षा के बजाय ब्राह्मणवादी अभिजात वर्ग की उच्च शिक्षा के लिए ही करती थी। शूद्र-अतिशूद्रों को शिक्षा के जो मौके मिले थे वे कुछ मिशनरियों और सहृदय यूरोपीय व्यक्तियों के कारण ना कि औपनिवेशिक हुकूमत द्वारा उनके लिए किये गए किसी प्रयास की वजह से। फुले की बात की पुष्टि इस तथ्य से भी होती है कि 1947 में भी भारत की साक्षरता दर मात्र 12% थी जिसमें भी शूद्र-अतिशूद्र शायद 1% से भी नीचे थे। यद्यपि कुछ नौकरियां फ़ौज, रेलवे, आदि में मिली थीं लेकिन 1893 में फ़ौज में लड़ाकू जाति के सिद्धांत के तहत महार, आदि दलित जातियों की भर्ती बंद कर दी गई।  

निष्कर्ष यह कि अपने जीवन के अंतिम दशक में फुले इस निष्कर्ष पर पहुंच रहे थे कि ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन शूद्र-अतिशूद्र जातियों के किसान-मजदूर-दस्तकारों के लिए एक निर्मम शोषण से भरा शासन था। उस पर वह कई सख्त टिप्पणी और कटाक्ष करते हैं और सुधार न होने पर विद्रोह की चेतावनी भी देते हैं। पर उसके खिलाफ राष्ट्रीय आंदोलन को खड़ा करने के जो प्रयास उस समय चल रहे थे उसका नेतृत्च भी ब्राह्मणवादी अभिजात तबके के हाथ में था जो अपने तात्कालिक आर्थिक-राजनीतिक हितों के लिए आधुनिक जनतांत्रिक सिद्धांतों की बात तो करता था लेकिन अपने सामाजिक-सांस्कृतिक चरित्र में पूरी तरह कटटर पुरातनपंथी था। अतः फुले की नजर में इस आंदोलन में शूद्र-अतिशूद्र जनता का कोई हित नहीं था। इसलिए फुले उसका सख्त विरोध करते हुए उससे जुड़ने से साफ इंकार भी करते हैं। 

तब सवाल उठता है कि औपनिवेशिक शासन और ब्राह्मणवादी अभिजात तंत्र के खिलाफ एक स्वतन्त्र रेडिकल आंदोलन खड़ा करने का प्रयास फुले ने क्यों नहीं किया? यद्यपि 1885 में सत्यशोधक समाज के अंतर्गत फुले शूद्र जातियों के अलग धार्मिक संस्कारों के साथ-साथ श्रमिकों को भी संगठित करने का प्रयास कर रहे थे और उनके सहयोगी नारायण मेघजी लोखंडे ने मुंबई में प्रथम श्रमिक संगठन बनाया था लेकिन अपने जीवन के अंतिम वर्षों में उनका ध्यान धार्मिक-सामाजिक सुधारों पर ही ज्यादा रहा। इसे सिर्फ फुले की व्यक्तिगत ही नहीं उस समय तक भारत के किसान-श्रमिक जनसमुदाय की राजनीतिक चेतना, शिक्षा की सीमा ही मानना चाहिए। किन्तु उनके बाद भी उनके सत्यशोधक समाज में इस दिशा में आगे बढ़ने लायक नेतृत्व का अभाव था और वह जल्द ही बिखर गया। 
फुले के बाद इस औपनिवेशिक शासन और ब्राह्मणवादी पुरातनपंथ के विरुद्ध एक राष्ट्रीय आंदोलन के विचार को आगे बढ़ाने का प्रथम गंभीर प्रयास कनाडा-अमेरिका में प्रवासी पंजाब के किसान-मजदूर तबके द्वारा हुआ जिसके संगठन ग़दर पार्टी ने मात्र राजनीतिक आजादी ही नहीं, बल्कि आर्थिक समानता और धर्म-जाति आधारित विभेद की समाप्ति को भी अपना लक्ष्य बनाया। भगत सिंह और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन ने भी इस दिशा में कदम बढ़ाये। मगर आम जनसमुदाय को राजनीतिक रूप से सचेत और संगठित करने के पहले ही सशस्त्र संघर्ष में कूद पड़ने की स्थितियों में यह धारा बहुत आगे नहीं बढ़ पाई। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी भी अपनी वैचारिक समझ की गंभीर कमजोरियों की वजह से इस धारा के आधार पर आगे बढ़ने के बजाय अंतर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन के सामान्य फैसलों को ही भारत में लागू करने में जुटी रही। इसी का नतीजा था कि जिस ब्राह्मणवादी अभिजात तबके द्वारा नीत राष्ट्रीय आंदोलन के खिलाफ फुले सचेत कर रहे थे वह ही भारत के राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व हासिल करने में सफल रहा और उसने राजनीतिक सत्ता प्राप्त की लेकिन इस क्रम में भारतीय समाज में धर्म-जाति आधारित प्रतिक्रियावादी विचारों और अन्याय को भी स्थापित रखा। यही भारतीय इतिहास की बड़ी त्रासदी है।

09.01.2017